Rav Maldev Rathore | राव मालदेव राठौड़

 Rav Maldev Rathore | राव मालदेव राठौड़

जोधपुर रियासत में राव जोधा के बाद सबसे प्रतापी शासक राव गांगा राठौड़ के पुत्र राव मालदेव राठौड़ थे राव मालदेव राठौड़ को खानवा के युद्ध में इनके पिता द्वारा सेना सहित भेजा जाता है जो राणा सांगा के नेतृत्व में मुगल बाबर के विरुद्ध युद्ध होता है राजा बनने की  उत्सुकता ऐसी की पुत्र ही अपने पिता का हत्यारा बन जाता है राव मालदेव राठौड़ द्वारा अपने पिता को मेहरानगढ़ दुर्ग के ऊपर से धक्का देकर नीचे गिरा दिया जाता है जिस कारण इनके पिता की मृत्यु हो जाती है इस घटना के कारण राव मालदेव राठौड़ को मारवाड़ का पित्र हत्था कहा जाता है राव मालदेव राठौड़ ने 1531-1562 जोधपुर रियासत पर शासन चलाया था


राव मालदेव राठौड़
 राव मालदेव राठौड़

राज्य अभिषेक और रूठी रानी 

राव मालदेव राठौड़ का राज्याभिषेक सोजत में 1531 में किया जाता है जब मालदेव जोधपुर के राजा बने तब उनकी रियासत में उनके अधीन दो परगना था राव मालदेव  राठौड़ का विवाह जैसलमेर की राजकुमारी  तथा  महारावल  लूणकरण की पुत्री उमादे के साथ हुआ था उमा दे  को इतिहास में  रूठी रानी के नाम से भी जाना जाता है उमादे को रूठी रानी  इसलिए कहा जाता है की जब शादी की अगली रात को जब दासी भारमली रानी उमा दे का संदेश  राजा मालदेव राठौर के पास लेकर आई तो  राजा दासी  के रूप को  देखकर  मोहित हो गए  और जब इस बात की सूचना  रानी उमा दे को चले तो वह रूठ कर  अजमेर  के दुर्ग तारागढ़ चली गई और अपना संपूर्ण जीवन वही व्यतीत किया राजा  मालदेव राठौड़  ने अपनी शक्ति बल और रण कौशल द्वारा अपने जीवन काल 52  युद्धों में 58 परगना पर अधिकार किया और अपने साम्राज्य को विशाल साम्राज्य में बदला



पहोबा या साहेबा का युद्ध 

जोधपुर रियासत के राजा बनने के बाद राव मालदेव राठौड़ ने सर्वप्रथम बीकानेर के राजा जेतसी राठौड़ के विरुद्ध पहोबा या साहेबा का युद्ध किया यह युद्ध 1541 ईस्वी में हुआ था इस युद्ध में राजा जेतसी राठौर की मृत्यु लड़ते हुए हो जाती हैं और युद्ध में राजा मालदेव राठौड़ की विजय हो जाती है जेतसी राठौड़ का पुत्र कल्याणमल अपने साम्राज्य को वापिस अधिकार में लाने के लिए तथा सहायता प्राप्त करने के लिए दिल्ली चला जाता है और दिल्ली का शासक शेरशाह सूरी पूर्ण विश्वास दिला कर उनको अपने महलों में स्थान प्रदान करते हैं राव मालदेव राठौड़ द्वारा मेड़ता के शासक वीरमदेव पर आक्रमण करता है और इस आक्रमण में वीरमदेव की पराजय होती है और वह कल्याणमल की राह पर चलता हुआ दिल्ली के शासक शेरशाह सूरी के पास चला जाता है

दिल्ली का सूर वंश 

दिल्ली पर शेरशाह सूरी द्वारा सूर वंश की स्थापना की जाती है शेरशाह सूरी द्वारा मुगल शासक हिमायू को 1539 ईस्वी में चौसा के युद्ध में पराजित कर दिया जाता है और उसके बाद 1540 के कन्नौज युद्ध में मुंह की खाने के बाद हिमायू अपनी जीवन की रक्षा में इधर-उधर भटकता है वह सहायता के लिए जोधपुर के राजा  मालदेव राठौड़  से सहायता मांगता है परंतु हिमायू के पुस्तकालय का अध्यक्ष रह चुका तथा उसका विश्वसनीय व्यक्ति मुल्लाह सुर्ख द्वारा अनहोनी का अंदाजा लगा कर वह हिमायू को जोधपुर के शासक मालदेव राठौड़ पर विश्वास न करने को कहा के उपरांत हिमायू मारवाड़ के रास्ते होता हुआ सिंध चला जाता है

( शेरशाह सूरी का नाम फरीद खान था जब उसने एक शेर को मारा तो वह शेरशाह कहलाया )

दरबारी विद्वान 

राजा मालदेव राठौर के दरबार में कई विद्वान है जिनमें से प्रमुख आशानंद थे जिन्होंने साहैबा के युद्ध में भाग लिया था आशानंद ने "बाघा भारमली रा दुआ" इस ग्रंथ में इन्होंने दोहे लिखे हैं जिसमें दासी भारमली तथा बाघा का वर्णन किया गया आशानंद ने दूसरा ग्रंथ "उमा दे भटियाणी रा कवित" लिखा था राजा मालदेव राठौड़ के दरबार में दूसरे विद्वान थे ईसरदा चारण उन्होंने "हाला झाला री कुंडलियां" (अन्य नाम सूर सतसइ) जिसमें 700 दोहों का संग्रह किया गया है ईसरदा की अन्य दो कृतियो के नाम है - देवीयाण और हरि रस



उपाधियां 

राजा राव मालदेव राठौड़ को हसमत वाला राजा भी कहा जाता था यह उपाधि उनको फारसी इतिहासकारों ने दी थी राजा राव मालदेव राठौड़ को हिंदू राजा भी कहा जाता था

गिरी सुमेल का युद्ध 

राव मालदेव राठौड़ ने कई दुर्गों का निर्माण भी करवाया था उन्होंने पोकरण दुर्ग , मेड़ता का दुर्ग , रिया का दुर्ग , सोजत का दुर्ग आदि राव मालदेव राठौर जोधपुर रियासत की एक शक्तिशाली शासक के रूप में उभर चुके थे उनकी सेना में कई वीर सेनापति थे जिन्होंने अपने रण कौशल से अपने राजा को अनेक रियासतों पर विजय प्राप्त दिलवाई थी जब हिमायू सिंध चला गया तो दिल्ली पर शेरशाह सूरी अधिकार था शेरशाह सूरी द्वारा सुमेल नामक स्थान पर  अपनी सेना का पंडाल डाला गया  और दूसरी तरफ  जोधपुर रियासत के राजा  राव मालदेव राठौर ने  गिरी नामक स्थान पर  अपना पंडाल डाला था  इस कारण इस युद्ध को  सुमेर गिरी  या  गिरी सुमेल  का युद्ध भी कहते हैं

( जोधपुर शहर की चारदीवारी का निर्माण राजा राव मालदेव राठौड़ द्वारा करवाया जाता है )

शेरशाह सूरी ने 5 जनवरी 1544 को सुमेल गिरी नामक स्थान पर जोधपुर रियासत के सेनापति जेता व कूपा और शेर शाह सूरी की सेना के मध्य युद्ध हुआ युद्ध से पहले शेरशाह सूरी द्वारा मारवाड़ की सेना की शक्ति को कम करने के लिए छल कपट का सहारा लिया गया इस छल कपट में उसने जोधपुर रियासत के राजा राव मालदेव राठौड़ को यह संदेश भेजना दिया गया कि युद्ध में उसके सेनापति उसका साथ नहीं देंगे इतनी सी बात पर राजा राव मालदेव राठौड़ विश्वास कर लेते हैं और वहां अपनी सेना को लेकर वापिस जोधपुर चले जाते हैं जब इस बात की सूचना उनके सेनापति जेता कुपा को लगती है तो यह दोनों सेनापति अपने दल के साथ युद्ध करने का निर्णय लेते हैं और अपने राजा को विश्वास दिलाने के लिए अकेले युद्ध में छोटी सी टुकड़ी के साथ चले जाते हैं युद्ध शुरू होता है और युद्ध में मारवाड़ के सेनापति रण कौशल द्वारा शेरशाह सूरी की सेना पर भारी दिखते हैं छोटी सी सेना के साथ जेता व कूपा वीरता से और शेर शाह सूरी की लाखों की सेना गाजर मुली की तरह अपनी तलवार की धार सेे काटते हैं युद्ध में शेरशाह सूरी को अपनी हार दिखती हुई नजर आती है उधर शेरशाह सूरी की सेना में कल्याणमल और वीरमदेव भी मालदेव के विरुद्ध लड़नेे के लिए आते हैं अंत में हारती हुई शेरशाह सूरी की सेना को सहायता देेने के जलाल खान जलवणी अपनी सेना लेकर आता है और थकी हुई जेता व कूपा की सेना पर आक्रमण कर देता है इस आक्रमण में जेता व कूपा बड़ी वीरता से अपनी सेना सहीत लड़ते हुए  वीरगति को  प्राप्त होते हैं इस युद्ध के उपरांत राव मालदेव राठौड़ को जब इस बात की सूचना मिलती है कि उसके सेनापति बड़ी वीरता से लड़तेेेे हुए वीरगति को प्राप्त हुुए हैं और दूसरी तरफ शेरशाह सूरी ने युद्ध के अंत में यह कहा हैै कि "मैं मुट्ठी भर  बाजरे के लिए  हिंदुस्तान की  सल्तनत  खो देता" इस युद्ध को जैतारण का युद्ध भी कहते हैं



( जेता व कूपा मारवाड़ के आसोप ठिकाने के शासक थे कूपा रिश्ते में जेता के चाचा लगते थे और आगे चलकर इनके वंशज कूपा से कुपावत  और जैता से जैतावत कहलाए )

जोधपुर रियासत के राजाओं की शरण स्थली 

जैतारण के युद्ध के बाद शेरशाह सूरी जोधपुर पर अधिकार कर लेता है और मालदेव राठौड़ जोधपुर को छोड़कर शिवाना चले जाते हैं शिवाना का दुर्ग को मारवाड़ के राठौड़ों की शरण स्थली कहा जाता है क्योंकि जब जोधपुर के शासकों पर संकट की घड़ी आती है तो वे संकट की घड़ी में शिवाना के दुर्ग में समय व्यतीत करते हैं

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राजा राव मालदेव राठौड़ ने अपने जीवन काल में ही अपने सबसे छोटे पुत्र राव चंद्रसेन राठौड़ को जोधपुर का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था छोटे पुत्र को अधिकार मिलने से राव मालदेव राठौड़ के बड़े पुत्र उदय और राम नाराज थे और राजा राव मालदेव राठौड़ की मृत्यु के बाद बड़े भाइयों (राम और उदय) अपने छोटे भाई (राव चंद्रसेन) विरुद्ध संकट खड़े किए



अगर राजा राव मालदेव राठौड़ अपने सेनापतियों पर विश्वास जताते और शेरशाह सूरी के विरुद्ध युद्ध करते तो वे दिल्ली पर भी अपना अधिकार कर लेते और पूरे हिंदुस्तान को अपने अधिकार क्षेत्र से चला सकते थे परंतु इतिहास में वे आज भी एक महान राजा के रूप में विद्यमान हैं जिन के दरबार में विद्वान और स्थापत्य कला के कई कलाकार भी मौजूद थे
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