हाड़ी रानी सहल कंवर: बूंदी की निडर राजपूत रानी (Haadi Rani Sehal Kanwar)

हाड़ी रानी सहल कंवर: बूंदी की निडर राजपूत रानी (Haadi Rani Sehal Kanwar)

वीरांगना हाड़ी रानी सहल कंवर की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। उनका जीवन साहस, वीरता और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक है। राजस्थान के इतिहास में उनका नाम Rajput Women Heroes और Female Warriors in Indian History के रूप में अमर है।

Haadi Rani Sehal Kanwar, बूंदी की निडर राजपूत रानी
हाड़ी रानी सहल कंवर – साहस, वीरता और कर्तव्य का प्रतीक

परिचय – हाड़ी रानी सहल कंवर कौन थीं?

इतिहास में हाड़ी रानी को अलग-अलग नामों से जाना गया। बूंदी के इतिहास में उन्हें सलेह कंवर या सहल कंवर कहा गया, जबकि कविराजा श्यामलदास की रचना वीर विनोद में उनका नाम कुँवरा बाई मिलता है। सलूम्बर के रिकॉर्ड में उन्हें इन्द्र कंवर के नाम से जाना गया।

उनकी कहानी बताती है कि कैसे Rajput Queen of Bundi ने साहस और कर्तव्य के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया।

जन्म और कुल वंश

हाड़ी रानी का जन्म बसंत पंचमी के दिन हुआ। वे हाड़ा चौहान राजवंश की संतान थीं। उनके पिता संग्राम सिंह खटकड़ बूंदी के जागीरदार थे। वे राव राजा शत्रुशाल हाड़ा की पौत्री और राव राजा भूपति सिंह की नाती थीं। उनका परिवार राजसी परंपरा, वीरता और सम्मान में विश्वास रखता था।

बाल्यकाल और साहस की झलक

सहल कंवर के बचपन में उन्हें गुरा नामक रोग था। उस समय केवल शेरनी (tigress) के दूध से ही उनका इलाज संभव था। बूंदी नरेश के आदेश पर शेरनी को पकड़ा गया और बूंदी के एक प्रमुख चौराहे पर बाँधा गया, जो आज “नाहर का चोहट्टा” के नाम से प्रसिद्ध है।

शेरनी का दूध पीने के बाद सहल कंवर स्वस्थ हो गईं और उनकी साहसिक प्रवृत्ति जाग्रत हुई। वे शेरनी के शावकों के साथ खेला करती थीं और इस अनुभव ने उन्हें fearless Rajput Queen बना दिया।

विवाह और कर्तव्य के लिए बलिदान

सहल कंवर का विवाह मेवाड़ के ठिकाने सलूम्बर के राव रतन सिंह चूण्डावत से हुआ। विवाह के अगले ही दिन महाराणा राज सिंह ने राव रतन सिंह को युद्ध के लिए बुलावा भेजा।

समाचार पढ़ते ही राव रतन सिंह विचलित हो गए। नवविवाहित जीवन और रानी की याद के बीच, वे युद्ध के लिए निकल पड़े।

हाड़ी रानी ने यह नहीं चाहा कि उनके कारण पति युद्ध में विचलित हों। उन्होंने अपनी सेविका को अपने शीश का टुकड़ा (lock of hair) निशानी के रूप में भेजा।

राव रतन सिंह ने निशानी रूपी शीश के रक्त से तिलक किया और युद्ध में गए। उनकी वीरता से Aurangzeb की सेना पराजित हुई।

औरंगजेब के खिलाफ युद्ध

यह युद्ध इसलिए हुआ क्योंकि औरंगजेब ने रूपनगर की राजकुमारी से विवाह करने का प्रयास किया। राजकुमारी पहले ही राणा राज सिंह की पत्नी बन चुकी थीं। राव रतन सिंह ने Haadi Rani Sehal Kanwar की प्रेरणा से अपने सैनिकों का नेतृत्व किया और Mewar Warriors की वीरता दिखाते हुए मुघल सेना को हराया।

वीरता और प्रेरणा

हाड़ी रानी सहल कंवर की वीरता का संदेश आज भी उतना ही प्रेरक है।
उनकी प्रसिद्ध पंक्ति:
“चुण्डावत मांगी सैलाणी, सिर काट दे दियो क्षत्राणी”
इससे यह स्पष्ट होता है कि राजपूत महिलाओं की वीरता और बलिदान किसी भी युद्ध में पुरुषों से कम नहीं था।

उनकी कहानी Rajasthan History में महिला शक्ति और साहस का प्रतीक बन चुकी है।


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