Rao Chandrasen | राव चंद्रसेन
मारवाड़ के शासक राव मालदेव की मृत्यु सन 1562 में हो गई थी मृत्यु से पूर्व राव मालदेव ने अपनी रानी स्वरूप दे के पुत्र चंद्रसेन को जोधपुर का भावी राजा घोषित कर दिया था राव चंद्रसेन अपने भाइयों में सबसे छोटे थे परंतु युद्ध कौशल और बहादुरी में अपने बड़े भाइयों से भी अधिक सशक्त थे इस कारण राव मालदेव ने चंद्रसेन को जोधपुर का भावी राजा घोषित कर दिया था
राव मालदेव के 3 पुत्र थे राम सिंह , उदय सिंह और चंद्रसेन |राव मालदेव ने अपने जीवन काल में ही राम सिंह को सोजत की जागीर दे दी थी और उदय सिंह को फलौदी की जागीर प्रदान की थी परंतु जब 1562 में राव मालदेव की मृत्यु हुई तो राव चंद्रसेन का जोधपुर किले में राज्य तिलक किया गया और कुछ वर्षों के बाद ही उनके बड़े भाई राम सिंह सोजत को छोड़कर मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह के पास चले गए मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह ने राम सिंह को केलवा की जागीर प्रदान की थी
( राव चंद्रसेन का जन्म 1541 ईस्वी में हुआ था तथा 39 वर्ष की उम्र में निधन हो गया था )
लोहावट का युद्ध
दूसरी तरफ उदय सिंह फलोदी से अपनी सेना लेकर सोजत पहुंचे और वहां पर लूटपाट शुरू कर दे जब इसकी खबर राव चंद्रसेन को लगी तो चंद्रसेन भी सेना सहित पहुंचकर उदय सिंह को भागने के लिए विवश कर दिया था परंतु कुछ वर्ष के बाद राम सिंह और उदय सिंह दोनों मिलकर सोजत में फिर आक्रमण किया और चंद्र सेन ने अपनी सेना सहित इस आक्रमण का सामना किया इस आक्रमण में चंद्र सेन ने अपने बरछी के वार से उदय सिंह को घायल कर दिया और उदय सिंह को उनके सहयोगियों ने युद्ध मैदान से बाहर निकाल कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया और इस युद्ध में राव चंद्रसेन की विजय हो जाती है
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उदय सिंह अपने कुछ सैनिकों के साथ युद्ध मैदान से निकलकर अकबर के पास चले जाते हैं और अपने साथ पूरी घटना का विवरण अकबर को सुनाते हैं अकबर भी राजपूताने में अपने वर्चस्व को बढ़ाना चाहता था और ऐसे ही मौके की तलाश में था कि कब राजपूताने के शासकों में फूट पड़े और उसे हस्तक्षेप का मौका मिल सके अकबर तुरंत प्रभाव से अपने नागौर के सेनापति हुसैन कुली खान को आदेश देता है कि वह अपनी सेना लेकर जोधपुर पर आक्रमण करें हुसैन कुली खान 8 से 10 महीने की घेराबंदी करने के बाद जब जोधपुर किले में रसद और जल की कमी हो जाती है तब राव चंद्रसेन युद्ध का निर्णय लेते हैं और इस युद्ध में हुसैन कुली खान जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग पर अधिकार कर लेता है जोधपुर का दुर्ग राव चंद्रसेन के हाथ से निकलने के बाद वे भाद्राजून चले जाते हैं
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| राव चंद्रसेन |
नागौर दरबार
नागौर दरबार का आयोजन 1570 में किया जाता है इस दरबार में अकबर अजमेर से पहुंचता है और नागौर में एक तालाब का निर्माण करवाता है जिसको शुक्र तालाब भी कहते हैं इस दरबार में अकबर राजपूताने के राजाओं को आमंत्रित करता है और इस दरबार में अधिकांश राजा शामिल होते हैं जिससे अकबर को राजपूताने में अपने सहयोगियों और विरोधियों में अंतर करने का सुअवसर प्रदान हो जाता है दरबार में बीकानेर के शासक रायसिंह अपने पुत्र कल्याणमल व पृथ्वीराज राठौड़ को लेकर शामिल होते हैं , जैसलमेर के शासक हरराय भाटी शामिल होते हैं और जोधपुर के राव चंद्रसेन के बड़े भाई राम सिंह और उदय सिंह भी इस दरबार में पहले से ही मौजूद होते हैं राव चंद्रसेन को भी अकबर ने दरबार में आमंत्रित किया था परंतु जब राव चंद्रसेन दरबार में पहुंचे और उन्होंने देखा कि अकबर राजपूताने के राजाओं को एक दूसरे के खिलाफ लड़ा कर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता है तब राव चंद्रसेन दरबार को बीच में छोड़कर चले जाते हैं
सन 1572 में अकबर ने जोधपुर का प्रशासक बीकानेर के राजा रायसिंह को नियुक्त किया और राम सिंह और उदय सिंह को शाही सेना में शामिल कर उन्हें युद्ध करने के लिए अन्य प्रांतों की ओर भेज दिया इससे दोनों भाइयों का ध्यान भी जोधपुर पर अधिकार को लेकर भंग हो गया और अगर अकबर किसी भी भाई को जोधपुर का राजा बना देता तो उसको राव चंद्रसेन का सामना करने के लिए तैयार रहना पड़ता इसी कारण अकबर ने रायसिंह को प्रशासक नियुक्त कर दिया और उसने अपना लक्ष्य राव चंद्रसेन को पकड़ने का रख लिया
( जब राव चंद्रसेन ने अकबर की अधीनता ना स्वीकार कर उसका विरोध करने का निश्चय किया तो आगे चलकर उनके इस मार्ग पर मेवाड़ के कुंवर महाराणा प्रताप भी चलें थे)
राव चंद्रसेन भाद्राजून में अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार कर रहे थे और जब इसकी सूचना अकबर को पता चलती है तो अकबर अपने सेनापति हुसैन कुली खान और जलाल खान को भाद्राजून पर आक्रमण करने के लिए भेजता है इस युद्ध में राव चंद्रसेन के वार से जलाल खान मारा जाता है और अंत में शाही सेना कि ज्यादा संख्या होने के कारण भाद्राजून पर शाही सेना का अधिकार हो जाता है परंतु हुसैन कुली खान राव चंद्रसेन को पकड़ने में असफल रहता है और राव चंद्रसेन भाद्राजून से निकलकर मेवाड़ रियासत में चले जाते हैं और इसके कुछ वर्षों बाद वे सेना को संगठित कर सोजत पर आक्रमण करते हैं और अधिकार कर लेते हैं
( विभिन्न इतिहासकारों के अनुसार राव चंद्रसेन के बारे में कहा जाता है कि वे मारवाड़ का प्रताप , प्रताप का अग्रगामी , भूला बिसरा राजा , महाराणा प्रताप के पथ प्रवर्तक थे )
शाही सेना के पुनः आक्रमण के कारण तथा सेना की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए वे सोजत को छोड़ देते हैं और पाली के जंगलों में चले जाते हैं कुछ वर्षों तक इन्हीं जंगलों में रहकर वे छापामार युद्ध पद्धति का प्रयोग करते हैं और शाही सेना को खदेड़ने का प्रयास करते हैं राव चंद्रसेन राजपूताने के प्रथम शासक थे जिन्होंने युद्ध के लिए दुर्ग के स्थान पर जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों को ज्यादा महत्व पूर्ण माना था
( राव चंद्रसेन मारवाड़ के प्रथम और अंतिम शासक थे जिन्होंने मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की और महलों के विलासिता पूर्ण जीवन को त्याग कर जंगलों के कष्टदायक जीवन को चुना था और इस से यह साबित होता है कि वे एक महान योद्धा और वीर क्षत्रिय थे जिन्होंने अपने पूर्वजों की तरह अपने राज्य की जनता की रक्षा के लिए कष्ट भरा मार्ग चुना था )
जंगलों में कई वर्ष बिताने के बाद आर्थिक स्थिति और सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने अपने पिता के दिए गए अमूल्य रत्नों , उपहारों को मेवाड़ के शासक राणा उदय सिंह को सौंपा और इनसे जो रकम प्राप्त हुई उसको अपनी सेना की जरूरतों तथा हथियारों की पूर्ति पर खर्च किया था |11 जनवरी 1581 को राव चंद्रसेन की मृत्यु सारण के जंगलों में हो गई थी और वर्तमान में भी उनकी छतरी वहां पर मौजूद है

1 comments:
Click here for commentsBhut acha
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