Jhala dynasty | झाला राजवंश
अखंड भारत का एक ऐसा राजवंश जो अन्य राजपूत राजवंशों की तरह धर्म और जनता के लिए आक्रमणकारियों के विरुद्ध हमेशा युद्ध के लिए तत्पर रहा यह राजवंश था मकवाना अर्थात जो कालांतर में झाला राजवंश कहलाने लगा
प्राचीनतम जानकारी
ब्रह्मा जी के 10 पुत्र थे भृगु , नारद , दक्ष , वशिष्ठ , मरीचि , अत्रि आदि इन पुत्रों में भृगु ऋषि के पुत्र विधाता हुए विधाता ऋषि के पुत्र गुरुकुल हुए और गुरुकुल ऋषि के पुत्र मार्कंडेय ऋषि हुए और उस समय राक्षसों का आतंक था राक्षस ऋषि यों के यज्ञ को भंग करने की कोशिश करते थे जिससे उनको दिव्य शक्ति प्राप्त ना हो सके इसलिए मार्कंडेय ऋषि ने यज्ञ से एक पुरुष का निर्माण किया और उस पुरुष का नाम कुंड मल रखा था कुंड मल ऋषियों की रक्षा राक्षसों से करते थे
आगे चलकर फिर ये मकवाना कहलाए क्योंकि मकवान का अर्थ यज्ञ से निकला हुआ पुरुष होता है कुंड मलजी ने यज्ञ और प्रार्थना द्वारा देवीय अस्त्र प्राप्त किए जिससे उन्होंने राक्षसों का अंत किया और इसके बाद इनके वंशज बद्रीनारायण क्षेत्र में रहने लगे कुंड मल जी के पांचवे वंशज राजा कुंज ने हिमालय की तलहटी में एक शहर का निर्माण किया इसके बाद उनके कई वंशज ने अधिकार किया और कई वर्षों तक अधिकार रहा फिर 332 वे वंशज राजा अमृत सेन जी हुए जिनके 5 पुत्र थे बड़े पुत्र चाचाक देव जी और छोटे पुत्र मालदेव जी के मध्य शिकार को लेकर झगड़ा हो गया
इस झगड़े ने युद्ध का रूप ले लिया दोनों के मध्य युद्ध हुआ जिसमें हस्तिनापुर के चाचाक देव जी हार गए इस हार के साथ चाचाक देव जी फतेहपुर सीकरी चले गए और वहां पर अपने राज्य की स्थापना की चाचाक देव जी के 72 वे वंशज कृपाल देव जी फतेहपुर सीकरी की गद्दी पर बैठे और इन्होंने सिंध पर आक्रमण कर दिया इस आक्ररमण में इनकी विजय हुई और अपना राज्य सिंध तक विस्तारित कर दिया और कीर्ति गढ़ पर अपना अधिकार कर लिया और वहां शासन करने लगे
मकवाना राजवंश का निवास स्थान कीर्ति गढ़ था जो सिंध के पास स्थित था सिंध के पास स्थित होने के कारण सिंध के शासक और कीर्ति गढ़ के शासकों के बीच युद्ध होता रहता था कीर्ति गढ़ के प्रथम शासक व्यास देव और उनका पुत्र केसर देव का युद्ध सिंध के शासक हमीर सुमरा से होता है प्रथम युद्ध में केसर देव की विजय होती है और हमीर सुमरा का घोड़ा केसरदेव लेकर ऋषि यों को दान दे देते हैं
आगे चलकर फिर ये मकवाना कहलाए क्योंकि मकवान का अर्थ यज्ञ से निकला हुआ पुरुष होता है कुंड मलजी ने यज्ञ और प्रार्थना द्वारा देवीय अस्त्र प्राप्त किए जिससे उन्होंने राक्षसों का अंत किया और इसके बाद इनके वंशज बद्रीनारायण क्षेत्र में रहने लगे कुंड मल जी के पांचवे वंशज राजा कुंज ने हिमालय की तलहटी में एक शहर का निर्माण किया इसके बाद उनके कई वंशज ने अधिकार किया और कई वर्षों तक अधिकार रहा फिर 332 वे वंशज राजा अमृत सेन जी हुए जिनके 5 पुत्र थे बड़े पुत्र चाचाक देव जी और छोटे पुत्र मालदेव जी के मध्य शिकार को लेकर झगड़ा हो गया
इस झगड़े ने युद्ध का रूप ले लिया दोनों के मध्य युद्ध हुआ जिसमें हस्तिनापुर के चाचाक देव जी हार गए इस हार के साथ चाचाक देव जी फतेहपुर सीकरी चले गए और वहां पर अपने राज्य की स्थापना की चाचाक देव जी के 72 वे वंशज कृपाल देव जी फतेहपुर सीकरी की गद्दी पर बैठे और इन्होंने सिंध पर आक्रमण कर दिया इस आक्ररमण में इनकी विजय हुई और अपना राज्य सिंध तक विस्तारित कर दिया और कीर्ति गढ़ पर अपना अधिकार कर लिया और वहां शासन करने लगे
मकवाना राजवंश का निवास स्थान कीर्ति गढ़ था जो सिंध के पास स्थित था सिंध के पास स्थित होने के कारण सिंध के शासक और कीर्ति गढ़ के शासकों के बीच युद्ध होता रहता था कीर्ति गढ़ के प्रथम शासक व्यास देव और उनका पुत्र केसर देव का युद्ध सिंध के शासक हमीर सुमरा से होता है प्रथम युद्ध में केसर देव की विजय होती है और हमीर सुमरा का घोड़ा केसरदेव लेकर ऋषि यों को दान दे देते हैं
पाटन की ओर प्रस्थान
द्वितीय युद्ध में हमीर सुमरा की विजय होती है और कीर्ति गढ़ के शासक और उसके पुत्र युद्ध भूमि में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं युद्ध के उपरांत केसर देव का पुत्र हरपालदेव कीर्ति गढ़ से होता हुआ वर्तमान गुजरात की तरह बढ़ता है और गुजरात में उसकी मुलाकात पाटन के शासक करण देव सोलंकी से होती है शासक करण देव हरपालदेव को कुछ गांव जागीर में देता है तथा पाटडी नामक स्थान को हरपालदेव अपना मूल निवास स्थान बनाते हैं हरपालदेव के सिंध से आकर गुजरात के पाटडी में बसना यह घटना क्रम ईस्वी संवत 1286-1300 के बीच का घटनाक्रम है
इतिहासकारों के मत
मकवाना वंश के बारे में विभिन्न विद्वानों के मत अलग-अलग है बाकी दास के अनुसार मकवाना राजवंश का संबंध मार्कंडेय मौखरी से है इसलिए यह मकवाना वंश कहलाया परंतु कई इतिहासकार यह मानते हैं कि झाला अपने को मारकंडे का वंशज मानते हैं इस कारण की मकवाना वंश कहलाया परंतु इतिहासकारों के अलग-अलग मत के कारण असमझ की स्थिति पैदा हो जाती है इतिहासकारों का एक पक्ष ऐसा है जो यह मानता है कि मकवाना वंश का शासन स्थान सिंध के मकवान क्षेत्र में रहा था इसलिए उसके बाद इनके वंशज मकवाना वंश कहलाने लगे
2300 गांव में तोरण बांधे
जब हरपालदेव करण देव सोलंकी के यहां पर थे तो उन्होंने करण देव सोलंकी के विरोधी दुश्मन को युद्ध में प्राप्त किया इस युद्ध में हरपालदेव की वजह से पूरे करण देव के साम्राज्य में उनकी जय जयकार होने लगी इस युद्ध में विजय के बाद हरपालदेव ने बाबरा को जीवित छोड़ दिया और उसने एक वचन दिया कि मैं आपकी हरदम सहायता करूंगा युद्ध के पश्चात करण देव ने हरपालदेव को कई गांव जागीर में दिए और उनको पुरस्कार मांगने के लिए कहा तब हरपालदेव ने राजा के समक्ष यह शर्त रखी कि मैं 1 दिन में जितने तोरण बांध लेता हूं तो वह सब गांव मेरे साम्राज्य में होंगे तथा उन सभी पर मेरा अधिकार होगा राजा ने यह शर्त मान ली और हरपालदेव ने सर्वप्रथम तोरण पाटडी गांव में बांधा तथा वहां अपना निवास स्थान बनाया तथा अंतिम तोरण दिगड़ीयू गांव में बांधा तथा मशाली गांव में हरपालदेव ने शक्ति देवी से विवाह किया बाबरा ने हरपालदेव का सहयोग किया और हरपालदेव ने 2300 गांव में तोरण बांधे जब अगली सुबह राजा कर्ण देव को पता चला के हरपालदेव ने आधे से अधिक साम्राज्य पर तोरण बांधकर अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया है
शक्ति माता का देवीय स्वरूप
जब हरपालदेव को लगा कि उसने लगभग आधे से अधिक साम्राज्य पर अधिकार कर लिया है तो हरपालदेव ने आधे गांव वापस उनके अधिकार क्षेत्र में लौटा दिए तथा अन्य गांव पर खुद का अधिकार रखा एक समय की बात है जब हरपालदेव के पुत्र महल के बाहर खेल रहे थे तथा उनकी माता शक्ति देवी झरोखे में बैठकर अपने कुंवारों को खेलते हुए देख रही थी तब अचानक एक पागल हाथी भागता हुआ इन कुंवारो की तरफ बढ़ता है परंतु हाथी के कुंवरओ तक पहुंचने से पहले ही उनकी माता शक्ति देवी महल के झरोखे से अपने हाथ द्वारा अपने कुंवारों को बचा लेती है तथा गुजराती भाषा में पकड़ने को "झालना" कहते हैं इस कारण हरपालदेव के बाद इनके वंशज झाला वंशज कहलाए
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जब शक्ति माता के देवी स्वरूप को सब ने देख लिया तो शर्त के अनुसार शक्ति माता ने धामा गांव में समाधि ले ली और आज भी चेत्र तेरस को विशाल मेला लगता है जहां पर देश विदेश से जन सैलाब दर्शन करने के लिए उमड़ता हैं
गोत्र - मकवाना
कुलदेवी - शक्ति माता
पर्व - त्रिपर्व
वेद - यजुर्वेद
गुरु - वशिष्ठ ऋषि
इष्ट देव - विष्णु
पिता - हरपाल देव जी
सहायक - बाबरा भूत
आराध्य देवी - हिंगलाज माता
आराध्य देव - सूर्य देव
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जब शक्ति माता के देवी स्वरूप को सब ने देख लिया तो शर्त के अनुसार शक्ति माता ने धामा गांव में समाधि ले ली और आज भी चेत्र तेरस को विशाल मेला लगता है जहां पर देश विदेश से जन सैलाब दर्शन करने के लिए उमड़ता हैं
झाला वंश की अन्य महत्वपूर्ण जानकारी
वंश - सूर्यवंशगोत्र - मकवाना
कुलदेवी - शक्ति माता
पर्व - त्रिपर्व
वेद - यजुर्वेद
गुरु - वशिष्ठ ऋषि
इष्ट देव - विष्णु
पिता - हरपाल देव जी
सहायक - बाबरा भूत
आराध्य देवी - हिंगलाज माता
आराध्य देव - सूर्य देव
राजपूताने में प्रवेश
हरपालदेव के वंशज पाटडी में शासन करते रहे परंतु 1500 के बाद इनके वंशज राजपूताने की ओर चले गए और कई वंशज पाटडी तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में अधिकार कर रहे थे वर्तमान में राजस्थान तथा गुजरात के विभिन्न क्षेत्रों में हरपालदेव के वंशज आज भी मौजूद है
झाला राजवंश में बहुत ही शूरवीर और शक्तिशाली राजा हुए जिन्होंने राजपूताने की रियासत में मेवाड़ के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई महाराणा संग्राम सिंह के समय राज राणा अजा जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई विक्रमादित्य के समय आशोजी महाराणा प्रताप के समय झाला मान सिंह और निरंतर झाला राजवंश मेवाड़ शासकों के लिए हमेशा अपना रक्त बहाने को तैयार रहता था मेवाड़ रियासत के राजाओं में झाला राजवंश प्रथम श्रेणी के जमीदार थे मेवाड़ रियासत में महाराणा के बराबर बैठने का अधिकार सिर्फ झाला राजवंश की शासकों को था महाराणा के मुकुट चिन्ह और वस्त्र धारण करने का अधिकार भी सिर्फ झाला राजवंश को था मेवाड़ रियासत मैंने कई जागीरे भी मिली थी आगे चलकर इनके पूर्वजों ने अपनी एक रियासत बनाई जिसका नाम झालावाड़ रखा था
झाला राजवंश में बहुत ही शूरवीर और शक्तिशाली राजा हुए जिन्होंने राजपूताने की रियासत में मेवाड़ के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई महाराणा संग्राम सिंह के समय राज राणा अजा जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई विक्रमादित्य के समय आशोजी महाराणा प्रताप के समय झाला मान सिंह और निरंतर झाला राजवंश मेवाड़ शासकों के लिए हमेशा अपना रक्त बहाने को तैयार रहता था मेवाड़ रियासत के राजाओं में झाला राजवंश प्रथम श्रेणी के जमीदार थे मेवाड़ रियासत में महाराणा के बराबर बैठने का अधिकार सिर्फ झाला राजवंश की शासकों को था महाराणा के मुकुट चिन्ह और वस्त्र धारण करने का अधिकार भी सिर्फ झाला राजवंश को था मेवाड़ रियासत मैंने कई जागीरे भी मिली थी आगे चलकर इनके पूर्वजों ने अपनी एक रियासत बनाई जिसका नाम झालावाड़ रखा था
4 comments
Click here for commentsNice line hkm
ReplyHi,can you help me that how many wife harpaldev had and how many son.
ReplyKing Harpal Dev had many queens but the chief among them was Rani Shakti and Raja Harpal Dev had 19 children
ReplySir muje kundmal se lekar harpaldev tak ke naam chahiye
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