गगन का गान
अचानक आंधियां चलने लगी इस मरू में
तमन्ना थी कि यह जल गिरे इस तरू मे
आंधियां का अतिक्रमण
इस मरूभूमि में उठ आया
चारों ओर अंधियारा छाया
इन आंधियों ने अपना प्रकोप दिखाया
सहसा एक परिवर्तन आया
जैसे ये गगन धरती में समाया
काल्पनिक दृश्य सामने आया
गगन ने इन आंधियों से युद्ध रचाया
कवि भौचक्का रह गया
जब बादल बादल से टकराया
दामिनी ने उधम मचाया
अंधियारे में भी उजाला छाया
कल्पित मन ने बतलाया
बरखा की बूँदों ने गगन का गान सुनाया
गगन के प्रहार से पराजित आंधियां में
लुप्त गुप्त सा हो आया
लो अचानक बरखा का दृश्य भी अदृश्य सा हो गया
यह कल्पित मन भी कहीं खो गया
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