Chittorgarh fort | चित्तौड़गढ़ दुर्ग
समय की मांग ने जन्म दिया चित्तौड़गढ़ दुर्ग को जिसने अपनी गोद में विभिन्न राजवंशों के वंशज तथा उनकी धर्म और संस्कृति को युगो युगो तक संजोए रखा लेकिन आज वह एकांत की आगोश में खामोश बैठा है जिसका इतिहास स्वर्णिम अक्षरों और तलवार की नोक पर लिखा गया था
बात है मौर्य वंश के प्रथम शासक चित्रांग मौर्य की जिसने चित्तौड़गढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया दुर्ग का निर्माण मेसा के पठार पर करवाया गया विशाल भू भाग पर फैला यह पठार एक दुर्ग बनाने के लिए उपयुक्त स्थान था चित्तौड़गढ़ चित्रांग का अपभ्रंश है चित्तौड़गढ़ दुर्ग ने अपनी गोद में कई मौर्य वंश के शासकों का शासन देखा और उन्हें शत्रुओं से सुरक्षित रखा लेकिन कोई ऐसा वंश नहीं जिसमें निकम्मे शासक का जन्म नहीं हुआ ऐसा ही समय 768 ईस्वी में आया जब मौर्य वंश में शासक बना मान मौर्य
मान मौर्य ऐसा शासक जो अपनी विलासिता पूर्ण जीवन जीने के लिए जाना जाता था मान मौर्य के समकालीन हरित ऋषि की गाय बप्पा रावल चराते थे बप्पा रावल एक क्षत्रिय राजवंश के वंशज थे हरित ऋषि की प्रार्थना और एकलिंग जी के आशीर्वाद से बप्पा रावल ने 768 ईसवी में चित्रांग दुर्ग अर्थात चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर आक्रमण किया और एकलिंग जी के आशीर्वाद से उनको विजय प्राप्त हुई
चित्तौड़गढ़ दुर्ग में अब नए गोहिल राजवंश अपना शासन स्थापित कर लिया था समय की मांग के अनुसार गोहिल राजवंश और सिसोदिया राजवंश के शासकों ने दुर्ग के परकोटे और उसकी चार दिवारी का समय-समय पर निर्माण कार्य करवाया
चित्तौड़गढ़ दुर्ग गंभीरी और बेड़च नदियों के संगम पर बना हुआ है यह दुर्ग सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर भारत के शासकों को दक्षिण में जाने के लिए इसी रास्ते से जाना पड़ता था जहां पर चित्तौड़गढ़ दुर्ग बना हुआ था इसलिए उत्तर भारत के शासक यह चाहते थे कि चित्तौड़गढ़ पर उनका अधिकार रहे परंतु ऐसा संभव सिसोदिया वंश के रहते हुए हो नहीं सकता था इसलिए तो विश्व का एकमात्र दुर्ग होगा जिस पर कई सारे आक्रमण हुए और इन आक्रमणों को सहते हुए यह दुर्ग वर्तमान समय में भी गौरवशाली मुद्रा में प्रतीत होता है विभिन्न आक्रमणों को अपनी छाती पर सहने और इसकी भव्यता ने विभिन्न विदेशी व भारतीय इतिहासकारों को अपने दांतो तले उंगली चबाने को मजबूर कर दिया इसलिए इतिहासकारों ने इस दुर्ग के बारे में कहा है कि
" गढ़ तो चित्तोड , बाकी सब गढ़ैया "
चित्तौड़ के शासक रावल रतन सिंह के शौर्य और उनकी महारानी पद्मिनी के जोहर को इस दुर्ग ने अपनी नम आंखों से निहारा था यह वही दुर्ग है जिसने खिलजी को अपने परकोटे के बाहर कई महीनों तक डेरा डालने के लिए मजबूर कर दिया था चित्तौड़गढ़ दुर्ग ने महाराणा सांगा के पराक्रम और उनकी युद्ध शक्ति के भी दर्शन किए थे चित्तौड़गढ़ वही दुर्ग है जिसने महाराणा कुंभा के समय मालवा और गुजरात के शासकों के संयुक्त आक्रमण को देखा और उन दोनों शासकों पर अपने शासक महाराणा कुंभा की विजय के भी दर्शन किए थे चित्तौड़गढ़ दुर्ग ने अपने आगोश में महाराणा कुंभा द्वारा बनाए गए कई मंदिरों और मीनारों को संरक्षण प्रदान किया चित्तौड़गढ़ दुर्ग उस पल का साक्षी बना जब महाराणा कुंभा ने विजय स्तंभ का निर्माण करवाया चित्तौड़गढ़ दुर्ग ने महाराणा कुंभा के स्वर्णिम स्थापत्य कला के काल का साक्षी बना
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| दुर्गों का सिरमौर चित्तौड़गढ़ |
चित्तौड़गढ़ दुर्ग ने महाराणा कुंभा के बाद हिंदू पत राणा सांगा के दर्शन किए जिन्होंने अपने रण कौशल से साम्राज्य का विस्तार दिल्ली की सीमा तक कर दिया था चित्तौड़गढ़ दुर्ग ने अपने अंतिम हिंदू सम्राट राणा सांगा की शौर्य गाथा को संजोग कर रखा और वही मीरा बाई के द्वारा गाए गए श्री कृष्ण के लिए भजनों की गूंज से भी परिचित है चित्तौड़गढ़ दुर्गे ने हाड़ी रानी कर्मावती कि राखी के मान को रखने के लिए गुजरात के शासक बहादुर शाह के आक्रमण के सामने चट्टान की तरह खड़ा रहा और चित्तौड़ के दूसरा साके का साक्षी बना चित्तौड़गढ़ ने दासी पुत्र के रक्त का उबाल भी देखा चित्तौड़गढ़ ने पन्नाधाय के प्रेम और त्याग की छवि को भी अपने मन में संजोए रखा है चित्तौड़गढ़ मेसा के पठार पर पहला ऐसा दुर्ग बना जिसमें जनता भी निवास करती थी इस दुर्ग ने महाराणा उदय सिंह के शौर्य की ज्वाला आज भी जला कर रखी है यह दुर्ग 1567 में एक चट्टान की तरह अकबर की सेना के आगे खड़ा रहा इस दुर्ग की भव्यता को देखकर अकबर भी चौंक गया था चित्तौड़गढ़ दुर्ग ने अकबर को घेरा डालने के लिए विवश कर दिया था क्योंकि इसकी चारदीवारी महाराणा कुंभा की और महाराणा सांगा के शौर्य से बनी हुई थी जिसको पार करना अकबर और मुगल वंश के बस में नहीं था चित्तौड़गढ़ दुर्ग में चार भुजाओं वाले देवता राव कल्लाजी के रण कौशल को अपनी आंखों से निहार रहा था चित्तौड़गढ़ दुर्ग साक्षी बना जब अकबर ने चित्तौड़ में जनता बच्चों और स्त्रियों का कत्लेआम मचाया 1567 का यह कत्लेआम मेवाड़ का तीसरा शाखा था जिसमें कई वीर राजपूत सैनिकों ने रण कौशल से देवताओं को प्रसन्न किया था चित्तौड़गढ़ दुर्ग ने कुंवर प्रताप की प्रतिज्ञा की आवाज भी सुनी जब चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर अकबर ने कब्जा कर लिया था चित्तौड़गढ़ दुर्ग में चेतक की टापो की आवाज को सुना था चित्तौड़गढ़ दुर्ग ने अमर सिंह से लेकर राज सिंह और आगे आने वाले सिसोदिया राजवंश के महाराणा का साक्षी है
चित्तौड़गढ़ दुर्ग को दुर्गों का सिरमौर भी कहते हैं इसका इतिहास में स्वर्णिम है कि इतिहासकारों ने इसको कई उपाधियों से सुशोभित किया है चित्तौड़गढ़ दुर्ग में विजय स्तंभ , कीर्ति स्तंभ , मीरा मंदिर , जैन मंदिर , कुंभ श्याम का मंदिर जयमल और पत्ता की हवेलियां रानी पद्मिनी का महल गोरा बादल के महल , जौहर कुंड आदि से सुशोभित है इस दुर्ग में वर्तमान समय में सीताफल के वृक्ष बहुल संख्या में देखने को मिल सकते हैं
चित्तौड़गढ़ दुर्ग आज एकांत की आगोश मैं स्वर्णिम इतिहास का अवलोकन कर रहा है यह दुर्ग अपने सिसोदिया राजवंश को चित्तौड़गढ़ जिले से उदयपुर में सिटी पैलेस में विराजमान अपने शासकों को याद करता है

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