आजादी अब बाकी हैं

          आजादी अब बाकी हैं

जंजीरें टूट गई, आजादी अब बाकी हैं
जर्जर निर्बल अव्यवस्थाओं के प्रति 
आवाज उठनी अब बाकी हैं।

जंजीरों से छूट गए हम,
लेकिन यह अव्यवस्थाएं अब बाकी हैं,
अव्यवस्थाओं से जूझ रहे,
लोगों की आवाज उठनी अब बाकी हैं। 

लोग रो रहे रोटी को,
अब पानी कहाँ यह बाकी हैं,
सरकारों तुम डुब मरो, 
यह आवाज उठनी अब बाकी हैं।

गरीबों की बात कहाँ हैं, 
यह सोच रहे अपने धन की,
हाय ! लगे गी तुम हैवानो को
सुन लो जरा इन गरीबों के मन की।

आज कवि का करूणा सागर,
टूट पड़ा तुम पर, 
इस ह्रदय में आवाज उठ रही
डूब मरों तुम हैवानो।

अपने भीतर छिपे उस दया तत्व
को तुम पहचानो।
यह आवाज गूंज रही,
इस भारत में आजादी अब बाकी हैं।
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