Baluji Champawat History | बल्लू जी चंपावत का इतिहास

Baluji Champawat | बल्लू जी चंपावत

Baluji Champawat History | बल्लू जी चंपावत का इतिहास स्वर्णिम अक्षरों से लिखा गया है इतिहास में जब भी मेवाड़ महाराणा राज सिंह सिसोदिया और नागौर के अमर सिंह राठौड़ का इतिहास के बारेे में वर्णन किया जाता है तब बल्लू जी चंपावत के योगदान को भी याद किया जाता है इस लेख में हम आपको बल्लू जी चंपावत के बारे में विस्तार से बताएंगे


बल्लू जी चंपावत की जागीर :-

Baluji Champawat History | बल्लू जी चंपावत का इतिहास
बल्लू जी चंपावत

बल्लू जी चंपावत जोधपुर रियासत के राजा के अधीन क्षेत्र की जागीर के जागीरदार थे उनकी वीरता से प्रभावित होकर जोधपुर रियासत के राजा ने उनको नागौर परगने के हरसोलाव ठिकाने की जागीर प्रदान की अर्थात बल्लू जी चंपावत हरसोलाव ठिकाने के जागीरदार थे बल्लू जी चंपावत जिस किसी को भी वचन दे देते थे तो वे उस वचन को पूरा करने अर्थात निभाने के लिए किसी भी संकट की स्थिति में पहुंच जाते थे बल्लू जी चंपावत जोधपुर रियासत के राजा गज सिंह राठौड़ के पुत्र अमर सिंह राठौड़ केे सहयोगी थे जब अमर सिंह राठौर जोधपुर से चले जाते हैं और मुगल बादशाह शाहजहां अमर सिंह राठौड़़ को नागौर क्षेत्र की जिम्मेदारी देतेे हैं तब अमर सिंह राठौड़़ एक राजा की तरह जीवन व्यतीत करते हैंं और मुगल बादशाह को कर्ज नहीं देतेे हैं और अपनी सेना भी बढ़ा देते हैं तब एक दिन बल्लू जी चंपावत किसी बात पर नाराज हो जाते और वहां सेेेे चले जाते हैं

बल्लू जी चंपावत द्वारा अपनी मूंछ का बाल गिरवी रखकर कर्ज लेना :-

बल्लू जी चंपावत हरसोलाव ठिकाने के जागीरदार थे जब हरसोलाव मे किसी भी समुदाय के लोग अपनी बेटी की शादी करते थे तो बल्लू जी चंपावत उनको आर्थिक रूप से सहायता देते थे यह सहायता वे जागीर में मिले अनाज को बेचकर देते थे बल्लू जी चंपावत अपनी जागीर में गरीब और अनाथ लोगों की मदद करते थे और उनकी बच्चियों के विवाह भी बल्लूची चपावत करवाते थे इस कारण वे जागीरदार होकर भी गरीब और बेसहारा लोगों के हितेषी बने रहे बल्लू जी चंपावत की पुत्री का विवाह की बात जब उनकी पत्नी ने बल्लू जी चंपावत से कहीं तो बल्लू जी चंपावत ने इस जिम्मेदारी को भी निभाया था जब उनकी पत्नी ने उनसे कहा कि जागीर का जो भी हिस्सा आता है उसको तो आप गरीब लोगों की मदद तथा उनकी बच्चियों के विवाह पर खर्च कर देतेे हो और इतना धन भी नहीं हैै जिससे आप हमारी बेटी का विवाह कर सको तब बल्लू जी चंपावत अपनी बेटी का विवाह करने के कुचामन के सेठ से ब्याज पर धन लेकर आते हैं और अपनी मूंछ का बाल को गिरवी रखते हैं कुचामन का सेठ उस मूंछ के बाल को चांदी की डिब्बी मे रखकर उस डिब्बी को निर्माण हो रही दीवार में रखवा देतेे हैं और इस पूरी घटना को किताब में लिखवा कर सुरक्षित रख देते हैं बल्लूू जी चंपावत अपनी बेटी का विवाह बड़ी शान से करते हैं

बल्लू जी चंपावत द्वारा अमर सिंह राठौड़ के शव को आगरा के किले से लाना :-

बल्लू जी चंपावत अमर सिंह राठौर से नाराज होकर चले जाते हैं और इसके कुछ वर्षों बाद अमर सिंह राठौड़़ द्वारा मुगल बादशाह के भरे दरबार में सलावत खां की अपनी कटार से हत्या कर देते हैं और वहां से निकाल कर वापिस नागौर पहुंच जाते हैं परंतु अर्जुन सिंह गौड़ जो की अमर सिंह राठौड़ के साले थे जो राज्य की अमर सिंह राठौड़़ से गद्दारी करतेे हैं जिसके परिणाम स्वरूप मुगल बादशाह शाहजहां अमर सिंह राठौड़ की हत्या करवााा देता है और उनकी लाश किले की छत पर रखवा देता है ताकि चील और कौवे उनकी लाश को खा जाए अमर सिंह राठौड़ की रानी सती होना चाहती थी इसलिए हाड़ी रानी ने अमर सिंह राठौड़ के विश्वसनीय सहयोगी बल्लू जी चंपावत को संदेश भिजवाया संदेश को पढ़कर बल्लू जी चंपावत भावुक हो गए और नागौर दरबार में पहुंच गए बल्लू जी चंपावत ने अमर सिंह राठौड़ के शव को लानेे की अपने ऊपर लेे लि


अपने 500 सैनिकों को लेकर आगरा केेे किले पर आक्रमण कर दिया बल्लू जी चंपावत अपने घोड़े को लेकर किले की छत तक पहुंच गए और अमर सिंह राठौर के शव को लेकर घोड़े को किले के ऊपर से छलांग लगवा दी जिससे घोड़े की मृत्यु हो गई और अमर सिंह राठौड़ के शव को अन्य सहयोगियों के साथ नागौर की तरफ रवाना कर दिया और बल्लू जी चंपावत मुगल बादशाह के सैनिकों को अपनी तलवार की धार से रोकने लगे उन्होंने बड़ी वीरता पूर्वक दौड़ते हुए मृत्यु को गले लगा लिया और दूसरी तरफ हाड़ी रानी अमर सिंह राठौड़ के शव के साथ सती हो जाती है बल्लू जी चंपावत केेे कारण ही अमर सिंह राठौड़ केे शव को वापिस ला पाते हैं बल्लू जी चंपावत लड़ते हुए युद्ध भूमि में काम आ जाते हैं बल्लू जी चंपावत की छतरी यमुना नदी के तट पर आगरा में बनी हुई है 

( अमर सिंह राठौड़ के शव को लाते हुए मुगल सेना से युद्ध करते हुए बल्लू जी चंपावत युद्ध भूमि में काम आ गए थे जहां बल्लू जी चंपावत का पहली बार दाह संस्कार किया गया था )

बल्लू जी चंपावत द्वारा मेवाड़ महाराणा राज सिंह को वचन देना :-


बल्लू जी चंपावत जब अमर सिंह राठौड़ से नाराज होकर चले गए थे तब भी मेवाड़ के महाराणा राज सिंह के पास गए परंतु मेवाड़ के महाराणा राज सिंह के दरबारियों के कहने पर बल्लू जी चंपावत को अपनी वीरता का परिचय देने के लिए शेर से लगवाया गया बल्लू जी चंपावत शेर से लड़ते हुए शेर को मार गिराते हैं तब मेवाड़ के महाराणा राज सिंह और दरबारी बहुत ही प्रसन्न हो जाते हैं उनकी वीरता देखकर बल्लू जी चंपावत शेर को मार कर महाराणा राज सिंह से कहते हैं कि वीरता की पहचान युद्ध भूमि में की जाती है किसी जानवर से लड़ा कर नहीं इतना कहकर वे अपने घोड़े पर चढ़कर मेवाड़ से चले जाते हैं मेवाड़ के महाराणा राज सिंह को बहुत ही दुख पहुंचता है कि उन्होंने एक ऐसे वीर को पहचान नहीं पाए अपनी गलती का संदेशा अपने सहयोगियों के साथ बल्लू जी चंपावत तक पहुंचाते हैं और एक उपहार के रूप में एक नव लक्खा  घोड़ा बी बल्लू जी चंपावत को उपहार में देते हैं बल्लू जी चंपावत मेवाड़ के महाराणा की गलती को माफ कर देते हैं और उनका उपहार स्वीकार कर लेते हैं और दरबारियों से कहते हैं कि जाकर कह देना अपने महाराणा से कि जब भी कभी मेरी जरूरत पड़े तो मुझे याद करना मैं जरूर आऊंगा आपकी सहायता करने दरबारी यह पूरी बात अपने महाराणा राज सिंह को बताते हैं इस घटना के 35 से 36 वर्ष बाद जब मुगल बादशाह औरंगजेब का शासन अपनी कुर्ता की चरम सीमा पर था तब औरंगजेब महाराणा राज सिंह पर आक्रमण करने का निर्णय करता है यह युद्ध देबारी की घाटी में होता है मेवाड़ के महाराणा राज सिंह अपनी छोटी सी सेना लेकर औरंगजेब से युद्ध करने जाते हैं औरंगजेब की लाखों की सेना के आगे महाराणा राज सिंह की सेना छोटी थी परंतु फिर भी एकाएक राजपूत बड़ी वीरता से मुगलों को मार गिरा रहे थे परंतु लाखों की संख्या की सेना के आगे टिक पाना मुश्किल हो रहा था तब मेवाड़ के महाराणा राज सिंह बल्लू जी चंपावत को याद करते हैं और कहते हैं कि अगर आज वह वीर मेरी सेना में होता तो हमारी विजय जरूर होती है फिर थोड़े ही समय के बाद मुगलों की सेना को चीरता हुआ एक वीर महाराणा राज सिंह के दिए हुए घोड़े पर सवार होकर दोनों हाथों में तलवार लेकर मुगलों के सिर कलम करता हुआ महाराजा राज सिंह कि सेना की तरफ आ रहा था महाराणा राज सिंह और उनकी सेना बल्लू जी चंपावत की वीरता देखकर फिर से उत्तेजित हो जाते हैं और युद्ध भूमि में मुगलों का मुकाबला डटकर करती है इस युद्ध में बल्लू जी चंपावत मुगलों की सेना से युद्ध करते हुए काम आ जाते हैं युद्ध के बाद महाराणा राज सिंह बल्लू जी चंपावत का दाह संस्कार करवाते हैं और देवारी की घाटी में एक छतरी का निर्माण करवाते हैं जो बल्लू जी चंपावत की थी

Baluji Champawat History Facts
Baluji Champawat History Facts

( बल्लू जी चंपावत महाराणा राज सिंह को दिए वचन को निभाने के लिए देवारी की घाटी में मुगल सेना से युद्ध करते हैं और वीरता पूर्वक लड़ते हुए युद्ध भूमि में काम आ जाते हैं जिसके बाद बल्लू जी चंपावत का दूसरी बार दाह संस्कार करवाया जाता है जिसका प्रमाण देवारी की घाटी में खड़ी छतरी दे रही है )

बल्लू जी चंपावत की मूंछ के बाल का दाह संस्कार :-

बल्लू जी चंपावत की चौथी और पांचवी पीढ़ी में सूर सिंह चंपावत पैदा हुए तब कुचामन के सेठ जिस से बल्लू जी चंपावत ने मूंछ का बाल गिरवी रखकर कर्ज लिया था उसी सेठ के वंशज जब पुरानी किताबों अर्थात खाता बही को पढ़ रहे थे तब उनको किताब में लिखी मूंछ के बाल गिरवी रखकर कर्ज लेने की बात आई इसके बाद सेठ का वंशज उस पुरानी किताब को हरसोलाव ठिकाने के जागीरदार सूर सिंह चंपावत के पास चला गया और फिर बल्लू जी चंपावत के कर्ज लेने तथा उस पुराने चांदी की डिब्बी को शुर सिंह चंपावत को दिखाया सुर सिंह चंपावत उस पुरानी किताब मैं लिखी बात को पढ़ा और चांदी की डिब्बी मे रखे मूंछ के बाल को देखकर प्रसन्न हो गए और और उससे कहा कि तेरा उस समय से लेकर आज तक जितना भी कर्ज होता है और जितने पैसे लिए थे उन सभी को मिलाकर मुझे ऐसा बता दे मैं तुझे अभी के अभी लौटा देता हूं फिर सूर सिंह चंपावत पैसे और उनका ब्याज लौटा देते हैं और कुछ उपहार भी देते हैं इसके बाद सूर सिंह चंपावत बल्लू जी चंपावत के मूंछ के बाल का विधि विधान के साथ दाह संस्कार करवाते हैं और ब्राह्मणों भोजन करवाते हैं और उनको दान भी देते हैं


( सूर सिंह चंपावत द्वारा बल्लू जी चंपावत की मूंछ के बाल का दाह संस्कार करना यह तीसरा दाह संस्कार बल्लू जी चंपावत का )
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