Amar singh rathore | अमर सिंह राठौड़ का इतिहास

अमर सिंह राठौड़  का जन्म  राठौड़ वंश की जोधपुर रियासत में 12 दिसंबर 1613 ईस्वी में होता है अमर सिंह राठौड़ के पिता जोधपुर रियासत के महाराजा गज सिंह राठौड़ थे तथा उनकी माता का नाम सोनगरी रानी मनसुख दे था जोधपुर रियासत के महाराजा गज सिंह के 3 पुत्र थे सबसे बड़े पुत्र अमर सिंह राठौड़ थे तथा उनसे छोटे जसवंत सिंह राठौड़ और सबसे छोटे अचल सिंह राठौड़ थे अचल सिंह राठौड़ की मृत्यु छोटी अवस्था में ही हो गई थी अमर सिंह राठौर हमेशा अपने साथ कटार रखते थे इस कारण अमर सिंह राठौड़ को कटार का धनी भी कहा जाता है

अमर सिंह राठौड़ और जोधपुर : 

जब जोधपुर रियासत में सन 1613 ईस्वी में महाराजा गज सिंह राठौड़ का शासन था तब उनकी रियासत में एक डाकू से सेठ साहूकार तथा अमीर व गरीब परेशान थे तब महाराजा गज सिंह राठौड़ ने डाकू को पकड़ने का प्रयास किया परंतु इसमें उनको असफलता प्राप्त हुई तब उनके पुत्र तथा भावी राजकुमार अमर सिंह राठौड़ ने भरे दरबार में महाराजा गज सिंह राठौड़ से आग्रह किया कि अगर आप आदेश दे तो मैं इस डाकू को पकड़ कर इस दरबार में ला सकता हूं और एक शर्त रखते हैं कि  उस डाकू को किसी भी तरह का दंड  नहीं दिया जाएगा  महाराजा गज सिंह राठौड़ उनकी बात को समझते हैं और महाराजा गज सिंह राठौड़ ने उन्हें आदेश दिया और आदेश की पालना करते हुए अमर सिंह राठौड़ डाकू को पकड़ने के लिए निकलते हैं जब उनका सामना डाकू से होता है तो डाकू  अमर सिंह राठौड़ को देखकर भयभीत हो जाता है तो अमर सिंह राठौड़ डाकू को विश्वास दिलाते हैं कि अगर तुम महाराजा के समक्ष उपस्थित होकर माफी मांगता है और भविष्य में किसी भी तरह की डकैती ना करने का प्रण लेगा तो महाराजा माफ कर देंगे और मैं भी एक राजपूत होने के नाते विश्वास दिलाता हूं कि तुझे किसी भी तरह की सजा नहीं होगी इतना सुनते ही डाकू आत्मसमर्पण करते हुए अमर सिंह राठौड़ के साथ महाराजा गज सिंह राठौड़ के दरबार में उपस्थित हो जाता है भरे दरबार में जब डाकू के गुनाहों को महाराजा के समक्ष सुनाया जाता है तो महाराजा डाकू को दंड देने का आदेश देते हैं तब अमर सिंह राठौड़ उन्हें वह बात याद दिलाते हैं कि जब मैंने आपसे कहा था कि अगर मैं डाकू को पकड़ कर लाता हूं तो आप उसे किसी भी तरह का दंड नहीं देंगे लेकिन महाराजा यह कहते हुए आदेश देते हैं कि इस डाकू ने आम जनता तथा गरीब लोगों लूटा है तो इससे दंड देना आवश्यक है जिससे आम जनता और गरीब लोगों को न्याय मिल सके इतना सब सुनते ही अमर सिंह राठौर दरबार से चले जाते हैं
Amar singh rathore / अमर सिंह राठौड़ का इतिहास
अमर सिंह राठौड़
अमर सिंह राठौड़ एक वीर और साहसी व्यक्ति थे जिन्होंने अपने प्रारंभिक जीवन में है जोधपुर रियासत की आम जनता के दिलों में अपना स्थान बना चुके थे वे आम जनता को डाकू से छुटकारा दिलाने के लिए उन्होंने डाकू को भी पकड़ा था लेकिन वह एक स्वाभिमानी पुरुष थे जिन्होंने अपने पिता के आदेशों का समानता पूर्वक पालन किया था जब महाराजा  गज सिंह राठौड़ ने अनारा  बेगम  के  कहने पर अमर सिंह राठौड़ को रियासत से निष्कासित कर दिया और छोटे पुत्र जसवंत सिंह राठौड़ को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तो अमर सिंह राठौड़ अपने साथियों के साथ जोधपुर रियासत से चले जाते हैं


अमर सिंह राठौड़ और मुगल बादशाह शाहजहां: 

जब दिल्ली के बादशाह शाहजहां को जानकारी प्राप्त होती है कि महाराजा गज सिंह राठौड़ ने बड़े पुत्र अमर सिंह राठौड़ को राज्य से निष्कासित कर दिया है तो शाहजहां अपने साथियों को आदेश देता है कि अमर सिंह राठौड़ को सम्मान देते हुए उन्हें हमारे दरबार में लेकर आओ शाहजहां अमर सिंह राठौड़ की वीरता और उनकी युद्ध शक्ति को भलीभांति जानता था इसलिए शाहजहां ने अमर सिंह राठौड़ को "राव की उपाधि" देकर नागौर का परगना सौंप दिया और दूसरी तरफ 1638 में महाराजा गज सिंह राठौड़ की मृत्यु हो जाती है तो उनके छोटे पुत्र जसवंत सिंह राठौड़ महाराजा का पदभार संभालते है

मतीरे की राड़ युद्ध : 

जब नागौर में अमर सिंह राठौड़ का शासन था तब बीकानेर रियासत में करण सिंह राठौड़ का शासन था बात है 1644 ईसवी की जब नागौर परगना के जाखमणीया गांव के किसान ने अपने खेत में मतीरा (तरबूज) को उगाया तो उस मतीरा (तरबूज) की बेल नागौर की सीमा पार करती हुई बीकानेर रियासत के किसान के खेत में चली गई और वहां पर एक मतीरा (तरबूज) लग गया अब दोनों किसानों में उस मतीरा (तरबूज) को लेकर झगड़ा हो गया जब यह झगड़े की बात गांव में फैलती है और गांव से होती हुई यह बात दूसरे गांव में तथा यहां से यह खबर सैनिकों तक पहुंच जाती है और जब सैनिकों द्वारा इसकी सूचना राव अमर सिंह राठौड़ तथा महाराजा करण सिंह राठौड़ को लगती है तो दोनों ही शासक  अपनी आम जनता तथा सैनिकों  को न्याय दिलाने के लिए युद्ध करने का निश्चय करते हैं और इस युद्ध को मतीरे की राड़ यह तो कहा जाता है


अमर सिंह राठौड़ मुगल दरबार में मतीरे की राड़ युद्ध के कारण उपस्थित नहीं हो पाते हैं और अमर सिंह राठौड़ मुगल सैनिकों को चराई कर जैसे अन्य प्रकार के कर भी नहीं देते थे और इससे दोनों ही शासकों के बीच संबंध बिगड़ते चले गए जिसका फायदा अमर सिंह के दुश्मनों ने उठाया

अमर सिंह राठौड़ और मुगल बादशाह में बिगड़ते संबंध :

अमर सिंह राठौड़ और मुगल बादशाह शाहजहां के बीच संबंध बिगड़ते चले गए और इसके पीछे शाहजहां के दरबार में उपस्थित लोगों ने एक षड्यंत्र रचे जिससे अमर सिंह राठौर और मुगल बादशाह शाहजहां एक दूसरे के शत्रु बन बैठे जब आगरा के दरबार में दीवाने खास में मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा राज्य को लेकर मंत्रणा तथा अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों को लेकर युद्ध की रचना तथा अन्य सभी महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर वार्तालाप होता था तो इस दरबार में सभी राज्य के राजा उपस्थित होते थे जो मुगल क्षेत्राधिकार में आते थे अमर सिंह राठौड़ की वीरता और उनके बाहुबल से सभी परिचित है इसलिए कई राज्य के दरबारी तथा मुगल दरबार के लोग उनसे ईर्ष्या करते थे जब भरे दरबार में अमर सिंह राठौड़ पूछा जाता है कि इतने दिन अनुउपस्थिति क्यों रहे और तभी शाहजहां के साले सलावत खान ने बादशाह से यह कह दिया कि नागौर परगना कर भी नहीं प्रदान करता है और सलावत खान द्वारा भरे दरबार में अमर सिंह राठौड़ को तुच्छ तथा निम्न शब्दों से संबोधित किया जाता है तभी अमर सिंह राठौर तुझसे से झल्ला उठते हैं और अपनी कटार निकाल कर सलावत खान का सिर धड़ से अलग कर देते हैं भरे दरबार में सभी राज्य के राजा तथा बादशाह शाहजहां भयभीत हो जाते हैं और अमर सिंह राठौर अपने घोड़े पर स्वार होकर किले से बाहर निकलने का प्रयास करते हैं लेकिन शाहजहां द्वारा सैनिकों को आदेश दिया जाता है कि जिले के सभी दरवाजे बंद कर दिए जाएं तदुपरांत अमर सिंह राठौड़ अपने विश्वसनीय घोड़े को किले के ऊपर से कूदाते हैं और मुगल सेना को मारते हुए नागौर परगने की सीमा में प्रवेश कर लेते हैं


जब इस घटना के बारे में सभी जगह चर्चा होने लगी और मुगल बादशाह शाहजहां की इज्जत की थू - थू होने लगी तो मुगल बादशाह शाहजहां अपनी इज्जत को तथा अन्य राज्य के राजाओं में अपनी छवि को दोबारा बनाने के लिए अमर सिंह राठौड़ को किसी भी तरीके से पकड़ने का लालच देने लगा और आदेश दिया कि जो भी व्यक्ति अमर सिंह राठौड़ को जीवित पकड़ कर लाएगा तो उसको जागीरदार बना दिया जाएगा जब बात का पता अमर सिंह राठौड़ के साले अर्जुन सिंह गौड़ को चलता है कि बादशाह ने जागीरदार बनने का फरमान जारी किया है  तो अर्जुन सिंह गौड़ लालच में आकर अपने बहनोई अमर सिंह राठौड़ को नागौर में समझाने का प्रयास करते हैं की समझाने आप को माफ कर दिया है और आपको आगरा किले में उपस्थित होने को कहा है परंतु अमर सिंह राठौड़ ने किसी भी बात का यकीन नहीं किया और वे चलने को राजी नहीं हुए तब अर्जुन सिंह गौड़ ने नागौर के अमर सिंह राठौड़ के साथियों को समझाया और साथियों तथा आम जनता के कहने पर अमर सिंह राठौड़ उन्हें आगरा जाने का फैसला करते हैं आगरा किले में प्रवेश करने से पहले अमर सिंह राठौड़ कहते हैं कि मैं इस किले में तभी प्रवेश करूंगा जब किले का दरवाजा पूर्ण रूप से खोल दिया जाए परंतु अर्जुन सिंह गौड़ उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि पहले मैं छोटे दरवाजे से प्रवेश करता हूं और फिर आप प्रवेश करें परंतु योजना अनुसार जब अर्जुन सिंह और प्रवेश करते हैं और उसके उपरांत अमर सिंह राठौड़ प्रवेश करते हैं तो अर्जुन सिंह दरवाजे के पीछे छुप कर अपनी तलवार से अमर सिंह राठौड़ पर वार करते हैं जिससे वह वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं तथा इसके बाद राजा शाहजहां आदेश देता है कि अमर सिंह राठौड़ के शव को किले की छत पर रख दिया जाए ताकि चील , कौवे उनके शरीर को अपना निवाला बना सके जब इस बात की सूचना  नागौर पहुंचती है कि अमर सिंह राठौड़ को धोखे से मौत के घाट उतार तो  अमर सिंह राठौड़ की रानी  सती होने  तथा अपने दरबारी और से कहती है कि  कोई ऐसा वीर है जो  एक वीर का शव  लेकर आ सके  तब नागौर से राजपूत सरदार बल्लू जी चंपावत के नेतृत्व में वीर राजपूत सैनिक आगरा पर धावा बोलते हैं और किले में प्रवेश करते हैं और अमर सिंह राठौड़ के शव को अपने साथ सम्मान पूर्वक नागौर ले जाते हैं और इसके बाद नागौर में उनकी रानी अमर सिंह राठौड़ के शव के साथ सती हो जाती है

जब अमर सिंह राठौड़ का वध कर दिया जाता है तब अर्जुन सिंह गौड़ बादशाह के समक्ष प्रस्तुत होते हैं और उनसे आग्रह करते हैं कि मुझे अपना पुरूस्कार प्रदान करें परंतु बादशाह शाहजहां यह कहते हुए अपनी तलवार से वार करता है कि जो अपने सगे संबंधियों का नहीं हो सका वह मेरा क्या होगा इसके बाद अर्जुन सिंह गौड़ को मौत के घाट उतार दिया जाता है

बादशाह शाहजहां यह आदेश देता है कि जिस दरवाजे पर अमर सिंह राठौड़ का वध किया गया था उस दरवाजे को हमेशा के लिए बंद कर दिया जाए ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि जब शाहजहां किले में आता जाता रहता था तो वह उस दरवाजे को देखता तो उसको अमर सिंह राठौड़ कि वह घटना याद आ जाती जब अमर सिंह राठौर ने भरे दरबार में उसके साले सलावत खान को मौत के घाट उतारा था इसके बाद सैनिक बादशाह  के आदेश का पालन करते हैं और दरवाजे को हमेशा के लिए बंद कर देते हैं तब इस दरवाजे का नाम बुखारा द्वार था करीब 200 वर्ष तक यह बुखारा द्वार बंद रहा और सन 1809 में जब अंग्रेजों का शासन था तब जॉर्ज स्टील आदेश देकर इस दरवाजे को खुलवाया था


वर्तमान समय में आगरा के किले में स्थित इस दरवाजे को अमर सिंह राठौड़ द्वार के नाम से जाना जाता है वर्ष भर में हजारों की संख्या में देश विदेश से भ्रमण करने सैलानी आते हैं और गाइड द्वारा उनको दुर्ग में अमर सिंह राठौर तथा शाहजहां के बीच घटी घटनाओं का वर्णन करा कर सैलानियों को बताया जाता है

अमर सिंह राठौड़ की याद में लोगों द्वारा खेल , नाटक( नौटंकी) के माध्यम से उनकी वीर घटनाओं को आम जनता तक पहुंचाया जाता है अमर सिंह राठौड़ की 16 खंभों की छतरी नागौर दुर्ग में बनी हुई है

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