Maharana kumbha | महाराणा कुंभा

Maharana kumbha | महाराणा कुंभा

मेवाड़ के महाराणा मोकल और उनकी पटरानी सौभाग्य देवी का एक पुत्र हुआ जो इतिहास में और समूचे राजपूताने में महाराणा कुंभा|Maharana kumbha तथा राणा कुंभा के नाम से प्रसिद्ध हुए तथा महाराणा कुंभा ने मध्यकाल में मेवाड़ रियासत की सीमाओं को दिल्ली तथा गुजरात तक विस्तारित कर दिया था मेवाड़ को एक शक्तिशाली रियासत के रूप में पहचान दिलाई थी मेवाड़ रियासत में महाराणा कुंभा के समय को साहित्य तथा स्थापत्य कला का स्वर्णिम काल कहा जाता है क्योंकि महाराणा कुंभा के समय सर्वाधिक साहित्य लिखे गए और स्थापत्य कला का सर्वाधिक विस्तार हुआ और कई सारे दुर्ग तथा भवनों का निर्माण कराया गया था

महाराणा कुंभा का जीवन परिचय :-

महाराणा कुंभा मेवाड़ के महाराणा मोकल तथा उनकी उनकी रानी सौभाग्य देवी के जेष्ठ पुत्र थे बचपन से ही बड़े बलवान व निडर थे महाराणा कुंभा का जन्म 1398 ईसवी में हुआ था महाराणा कुंभा का शासनकाल सन 1433 -1468 तक था महाराणा कुंभा शिव भक्त थे वे दिन में सुबह व शाम शिव जी की पूजा करते थे वे हिंदू शास्त्रों के ज्ञाता थे उन्होंने छोटी सी उम्र में ही हिंदू धर्म से संबंधित विभिन्न पवित्र पुस्तकों का अध्ययन किया तथा उस संस्कृति को अपने परिवेश में अपनाया महाराणा लक्ष्य सिंह की दासी के पुत्र चाचा तथा मेरा ने अवसर पाकर महाराणा कुंभा के पिता तथा तात्कालिक शासक महाराणा मोकल की हत्या कर दी और महाराणा मोकल की हत्या में चाचा तथा मेरा के अलावा और भी कई लोग उनके साथ शामिल थे इस कारण यह लोग चित्तौड़गढ़ से दूर मालवा के सुल्तान की शरण में चले गए और वहां जाकर रहने लगे थे महाराणा मोकल की हत्या के बाद 35 वर्ष की उम्र में महाराणा कुंभा 1433 ईस्वी में मेवाड़ रियासत के महाराणा बने और मेवाड़ के महाराणा बनते ही महाराणा कुंभा ने अपने मामा रणमल राठौड़ की सहायता से अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए प्रारंभिक रणनीतियां बनानी शुरू कर दी

Maharana kumbha | महाराणा कुंभा
महाराणा कुंभा
    

महाराणा कुंभा प्रारंभिक समस्याएं और चाचा व मेरा का दमन :-

महाराणा कुंभा मेवाड़ रियासत के राजा बनते ही सर्वप्रथम उन्होंने अपने मामा रणमल राठौड़ की सहायता से अपने पिता के हत्यारों को मौत के घाट उतारने के लिए निकल पड़े थे गुप्त सूचना के आधार पर जब पता चला कि चाचा व मेरा तथा उन के पुत्र मालवा के सुल्तान की शरण में चले गए हैं तो महाराणा कुंभा ने संदेश भिजवाया मालवा के सुल्तान के पास और अपने शत्रुओं को सौंप देने की बात कहीं परंतु मालवा के सुल्तान ने मना कर दिया तब महाराणा कुंभा ने रणमल राठौड़ तथा भीलों की सहायता से आक्रमण किया और इस आक्रमण में चाचा व मेरा तथा उनके पुत्र को मार गिराया महाराणा कुंभा ने रणमल राठौड़ के बढ़ते हस्तक्षेप को देखते हुए रणमल राठौड़ द्वारा नियुक्त सभी प्रमुख व्यक्तियों को हटाकर महाराणा कुंभा ने अपने हितेषी व्यक्तियों को नियुक्त कर दिया और सिसोदिया सरदारों ने अवसर पाकर रणमल राठौड़ की हत्या करवा दी हत्या का समाचार सुनते ही राव जोधा अपने राठौड़ सरदारों के साथ  मारवाड़ की तरफ निकले महाराणा कुंभा की सेना ने मंडोर पर अधिकार कर लिया परंतु हंसा बाई के नेतृत्व में दोनों रियासतों के बीच संधि हो गई और इस संधि को इतिहास में आवल बावल की संधि कहते हैं सत्ता संभाले कुछ वर्ष ही गुजरतेे थे कि महाराणा कुंभा मे मेवाड़ रियाासत की सीमाओं का विस्तार  दिल्ली के  सुल्तान महमूद शाह तथा गुजरात के सुल्तान  अहमद शाह  को हराकर  मेवाड़ रियासत की सीमा दिल्ली तथा गुजरात की सीमा तक पहुंचा दी थी इधर राजपूताने में भी राणा कुंभा ने हाडा राजपूत तथा आबू के शासक  को भी युद्ध में हराकर अपनी सीमा का विस्तार  कर दिया था जब चाचा व मेरा का दमन करनेेे के लिए मालवा पर आक्रमण किया था तो मालवा के सुल्तान भी अपनी हार का बदला लेने के लिए  आक्रमण की रणनीति बनाने लगा था सभी शासक  मेवाड़ की बढ़ती शक्ति से डरे हुए थे तथा अपनी हार का बदला लेने के लिए आतुर थे

1437 सारंगपुर का युद्ध और महाराणा कुंभा की विजय :-

जब मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने चाचा वह मेरा के सहयोगी रहे महपा पवार को लौटाने से मना कर दिया तो  मेवाड़ के महाराणा कुंभा  तथा मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी के बीच  1437 सारंगपुर का युद्ध होता है महाराणा कुंभा ने अपनी सेना लेकर मालवा पर आक्रमण कर दिया इस युद्ध में महाराणा कुंभा की सेना की विजय हुई और मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी को बंधक बना लिया महाराणा कुंभा ने 6 से 7 माह तक महमूद खिलजी को बंधक बनाकर रखा और उसके बाद उसे छोड़ दिया था इस विजय के उपलक्ष में महाराणा कुंभा ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग में विजय स्तंभ का निर्माण करवाया था जो 1440-1448 के 8 वर्षों में बनकर तैयार हुआ यह 9 मंजिला इमारत है यह इमारत 30 फीट चौड़ी तथा 122 फिट ऊंची इमारत है और इस पर सुंदर मूर्तियां कारीगरों ने बनाई है इस कारण इस स्तंभ को भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष कहा जाता है 


मेवाड़ की सीमाएं नागौर तक विस्तृत थी नागौर पर फिरोज खान की मृत्यु के बाद उसका बेटा शम्स खान नागौर का शासक बना शम्स खान मेवाड़ रियासत से स्वतंत्र होने का प्रयास कर रहा था और उसने मेवाड़ को कर देना भी बंद कर दिया इस कारण मेवाड़ के महाराणा कुंभा ने शम्स खान पर आक्रमण कर दिया शम्स खान ने आक्रमण से पहले ही गुजरात के शासक को पत्र लिखकर अपनी ओर मिला लिया और जब मेवाड़ के महाराणा कुंभा ने आक्रमण किया तो नागौर तथा गुजरात की संयुक्त सेना मेवाड़ की सेना के सम्मुख खड़ी थी परंतु मेवाड़ के वीर रणबांकुरे ने विजय प्राप्त की और महाराणा कुंभा की ख्याति चारों दिशाओं में फैलती चली गई जब गुजरात के शासक को यह समाचार मिला कि मेवाड़ के महाराणा कुंभा ने उसकी सेना को तथा नागौर की सेना को संयुक्त रूप से मात दे दी है तो गुजरात के शासक ने मेवाड़ पर आक्रमण करने की तैयारी करने लगा

1456 की चंपानेर की संधि और महाराणा कुंभा की विजय :-

गुजरात की सेना नागौर के शासक का साथ देते हुए मेवाड़ के महाराणा कुंभा से हार गई थी और इस हार का बदला लेने के लिए गुजरात के शासक कुतुबुद्दीन ने पत्र लिखकर मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी को संयुक्त रूप से मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए मना लिया मालवा का सुल्तान भी सारंगपुर की हार का बदला लेना चाहता था इसलिए गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन तथा मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने दोनों दिशाओं से रणनीति बनाकर आक्रमण करने का निश्चय किया इस संधि को इतिहास में चंपानेर की संधि के नाम से जाना जाता है जब इस बात की खबर मेवाड़ के महाराणा कुंभा को लगी तो उन्होंने इस रणनीति को अपनी सेना द्वारा विफल कर दिया और दोनों सुल्तानों की सेना को युद्ध मैदान में मार भगाया और महाराणा कुंभा की विजय होती है


महाराणा कुंभा की सांस्कृतिक उपलब्धियां :-

महाराणा कुंभा एक ज्ञानी राजा थे जिन्होंने विभिन्न पवित्र ग्रंथों का अध्ययन किया था महाराणा कुंभा ने राजपूताने में 32 दुर्गों का निर्माण करवाया था इन सभी दुर्गा में सर्वश्रेष्ठ दुर्ग कुंभलगढ़ दुर्ग है  जिसमें महाराणा कुंभा रहा करते थे महाराणा कुंभा ने अनेक ऐसे दुर्ग जो भगन अवस्था में थे उन का पुनः निर्माण करवाया तथा अपने राज्य की सीमाओं पर दुर्गों का निर्माण करवाया ताकि शत्रु को सीमा में प्रवेश करने से पहले ही मात दी जा सके और शत्रु सेना की गतिविधियों पर ध्यान रखा जा सके महाराणा कुंभा के शासनकाल को स्थापत्य कला का स्वर्ण काल कहा जाता है क्योंकि मेवाड़ के किसी भी महाराणा के शासनकाल में इतने दुर्गों तथा इमारतों का निर्माण नहीं हुआ था महाराणा कुंभा ने इन सभी दुर्गों को हिंदू रीति रिवाज के अनुसार निर्माण करवाया था महाराणा कुंभा के शासनकाल में अनेक मंदिरों का निर्माण हिंदू रीति रिवाज तथा संस्कृति के अनुसार हुआ था इन मंदिरों में भगवान विष्णु को समर्पित कुंभ श्याम मंदिर और ऐसे कई मंदिर हैं जो महाराणा कुंभा के शासनकाल में निर्मित हुए थे महाराणा कुंभा ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग में अपनी पुत्री रमाबाई के विवाह के लिए श्रृंगार चवरी का निर्माण करवाया था

( महाराणा कुंभा के 2 पुत्र तथा एक पुत्री थी महाराणा कुंभा के बड़े पुत्र का नाम उदय सिंह तथा रायमल था तथा उनकी पुत्री का नाम रमाबाई थी जो महाराणा कुंभा की तरह हिंदू ग्रंथों के ज्ञाता थी )

महाराणा कुंभा  जितने राजनीति में निपुण थे उतने ही वे एक विद्वान कवि भी थे उन्होंने अपने शासनकाल में कई ग्रंथों की रचना की थी महाराणा कुंभा बचपन से ही हिंदू संस्कृति की पवित्र पुस्तकों का अध्ययन कर चुके थे और वे इन सभी पुस्तकों को कंठस्थ भी कर चुके थे इस कारण वे बड़े रणनीतिकार योद्धा , राजा तथा सेवक और  संगीतकार भी थे वे भगवान शिव की आराधना दिन में दो बार किया करते थे महाराणा कुंभा ने अपने दरबार में कई विद्वानों को आश्चर्य दे रखा था जो विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े हुए थे दरबारी साहित्यकारों में मंडन , मोनीसुंदर , जय चंद्र सूरी , सोमदेव आदि प्रमुख विद्वान थे इन विद्वानों ने अनेक ग्रंथ तथा विभिन्न मंदिरों का भी निर्माण करवाया था
महाराणा कुंभा ने अपने शासनकाल में मेवाड़ की सीमाओं का सर्वाधिक विस्तार किया वे राजपूताने के अब तक के सर्वश्रेष्ठ शासकों में से एक थे महाराणा कुंभा ने अनेक ग्रंथ भी लिखे थे महाराणा कुंभा संगीत प्रेमी होने के कारण अभिनव भारताचार्य भी कहा जाता था महाराणा कुंभा ने 32 दुर्गों का निर्माण करवाया था तथा उनकी सेना में सैनिकों की संख्या बहुत ही ज्यादा होती थी इस कारण राजपूताने के सभी शासकों ने उनको हिंदू सुरतान की उपाधि दी थी

 ( महाराणा कुंभा की पटरानी के नाम पर इतिहासकारों में मतभेद हैं सभी इतिहासकारों ने अलग-अलग नाम बताए हैं )

महाराणा कुंभा ने अनेक ग्रंथ लिखे जिनमें संगीत राज सूड प्रबंध और संगीत मीमांसा प्रमुख ग्रंथ है उन्होंने कई नाटक रुपी ग्रंथ भी लिखे है महाराणा कुंभा को अनेक भाषाओं का ज्ञान था इस कारण उन्होंने अपने ग्रंथ विभिन्न भाषाओं में लिखे हैं महाराणा कुंभा को कुंभलगढ़ प्रस्तुति में राजगुरु , दान गुरू , परम गुरु , हाल गुरु , अश्वपति , गजपति , नरपति , छाप गुरु आदि विभिन्न उपाधियों से संबोधित किया गया है

महाराणा कुंभा की हत्या :-

महाराणा कुंभा को उन्मादी रोग हो गया था इस कारण वह अब अधिक समय अपने महल में ही कुछ बीताने लगे तथा समय मिलने पर वे जलाशय के किनारे तथा शांत जगह पर अकेले टहलने निकल जाते थे महाराणा कुंभा जब एक दिन जलाशय के किनारे अकेले बैठकर प्रकृति वातावरण को निहार रहे थे तब उनके पुत्र उदय सिंह जिसको उदा भी कहां जाता है उन्होंने आकर महाराणा कुंभा की तलवार से हत्या कर दी और खुद राजा बन बैठा परंतु सामंतों तथा अन्य ठिकाने दारो ने उदा को राजा स्वीकार नहीं किया और इतिहास में उदा पित्र हंता बन कर रह गया था
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