झीमू

झीमू


झीमू मेरे चाचा के यहाँ से दुध के अभाव में लाई गई, एक बकरी थी। वैसे खाद्य की किसी भी समस्या के समाधान के लिए पशु पालना ठीक हैं लेकिन जब मानव का स्वार्थ अधिक हाे जाता हैं तो मेरा मन विद्रोह करने लगता  हैं । 

जिस दिन झीमू और उसकी माँ का प्रवेश  हमारे घर हुआ, तो मैने उसे ध्यानपूर्वक देखा । पुष्ट लचीले पैर, चिकनी भरी हुई पीठ, छोटे-छोटे सींग, कमल की पंखुड़ियों की भाँति प्रतीत होते कान, पुंछ के अंतिम छोर का सफेद रंग जादु की छड़ी जैसा प्रतीत हुआ। उसकी आँखें काली-भूरी एवं मोतियों सी लगी। मैंने उसका नाम उसकी शारीरिक चेष्टाओं के आधार पर झीमू दिया।                 


झीमू वास्तव में प्रियदर्शन थी। विशेषत: उसकी काली-भूरी आँखों का तरल सौंदर्य तो दृष्टि को स्थिर कर देता। तब वह लगभग 15-16 दिन की थी।वह बहुत ही फुर्तिली और कोमल पंखुड़ी की भाँति थी।जो कभी-कभी तो हमारे मकान पर चढ़ जाती और वहाँ से कुद जाती।वह उसके लिए खेल था, जो वह आसानी से खेलती।

झीमू शीतकाल में जबरदस्त ठण्ड़ में भी मदमस्त होकर खेला करती। उसके खेल में इमु हमारा पालतु कुता शामिल था। दोनों एक दुसरे के पीछे दौड़ते, इस खेल में झीमू विजय रहती, क्योंकि वह आसानी से दीवार या कार पर चढ़ जाती और इमु उसे अपलक दृष्टि से देखता रहता। इमु उसकी प्रतिभा से वाकिब था।


सुबह तेज ठण्ड़ी पवनो के प्रहार से झीमू की माँ उसे अपने आँचल में समेट लेती। कुछ पहर बीतने के पश्चात वह हमारे कमरें में घुँस जाती थी, जब मैं चादर ओढे़ सो रहा होता। वह मेरे ऊपर कुदती रहती जब तक की मैं उठ न जाता। मानो वह अपनी संवेदनाओ से प्रतीत कराती हो कि उठो और मुझे कुछ खाद्य सामग्री दो।

एक दिन झीमू की माँ ने चुपके से कमरे मे घुँस कर कुछ ज्यादा ही दलिया खा लिया।उसके कुछ ही घंटे बाद उसका पेट गुबारे की तरह फुल गया। वह एक ही जगह बैठी रही चूकिं वह अभी उठने में समर्थ नही थी।             

उसके इलाज के लिए पिताजी ने देसी नुस्खा अपनाया, जिसे मैं एक विड़म्बना ही मानता हूँ। उन्होने शराब की बोतल बकरी के गलें में जबरदस्ती उतार दी।

कुछ ही समय पश्चात उसकी मोतियों जैसी आँखें स्थिर रह गई। जिसका आभास मुझे पुर्व से ही हो गया था।

झीमू इससे अंजान थी, शायद उसे इस संसार का कड़वा सच अभी पता नही था।मैं उस नादान झीमू को देखकर मन ही मन गम में डूबे जा रहा था। एक तरफ झीमू की माँ के चले जाने का गम था तो दुसरी तरफ झीमू के अकेले हो जाने का ।     
    
झीमू इससे अंजान थी, शायद उसे इस संसार का कड़वा सच अभी पता नही था।मैं उस नादान झीमू को देखकर मन ही मन गम में डूबे जा रहा था। एक तरफ झीमू की माँ के चले जाने का गम था तो दुसरी तरफ झीमू के अकेले हो जाने का ।                    

तत:पश्चात मैंने झीमू के अकेलेपन को देखते हुए, उसे वापस वहाँ से 1 कि.मी. दूर चाचा के घर जहाँ और भी बकरीयाँ थी, भेज दिया।

उस दिन मैं झीमू के बिछुड़ने से दु:खी था,लेकिन आज वह दु:ख और गम समयपर्यन्त समाप्त हो गये।आज उस दु:ख का आभास होता हैं।जब उस झीमू के ह्दय से महसूस करता हुँ, तो यह संसार नश्वर लगता हैं। 
                                 
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