बाड़मेर का राठौड़ राजवंश | Rathore Dynasty of Barmer
भारत की पश्चिमी भूमि पर विशाल भूभाग में फैला हुआ मरुस्थल जिसको थार का मरुस्थल कहते हैं इसी थार के मरुस्थल के एक भूभाग (जूना बाड़मेर) पर 12 वीं शताब्दी में परमार वंश के बाहड़ देव परमार का अधिकार था उसने अपने नाम से इस जगह का नाम बाहड़मेर रखा और अपनी राजधानी किराडू को बनाया
परमार वंश के शासक अपना अधिकार इस क्षेत्र पर अधिक समय तक नहीं रख पाए और उनको युद्ध में परास्त करके चौहान वंश के चौहानों ने यहां पर अधिकार कर लिया जब जूना बाड़मेर पर चौहान शासक सुजा का अधिकार था तब सिद्ध पुरुष रावल मल्लिनाथ जी के पुत्र जगमाल का विवाह सूजा चौहान की पुत्री से हुआ विवाह के बाद जगमाल के 3 पुत्र हुए जगमाल के तीन पुत्रों का नाम मंडलीक , भारमल और रणमल था महेवा रावल के वंशज होने के कारण जूना बाड़मेर के राठौड़ महेचा कहलाए
मंडलिक का जूना बाड़मेर पर अधिकार
जब जगमाल का विवाह गोहिलो के यहां निश्चित हुआ तब चौहान रानी नाराज होकर अपने तीन पुत्रों के साथ जूना बाड़मेर आ गई समय के साथ तीन पुत्र बड़े होते गए और धीरे-धीरे यह कुंवर अपने मामा सुजा के क्षेत्र में उपद्रव करने लगे अपने 3 भांजो को सुजा चौहान समझाने लगे कि आप यहां पर उपद्रव ना करें और अन्य कहीं क्षेत्र में चले जाएं परंतु जगमाल के पुत्रों ने इस बात को नहीं समझा और वहां उपद्रव मचाते रहे उपद्रव से यहां के चौहान परेशान हो गए और उन्होंने अपने भांजो को सबक सिखाने के लिए चौहान रानी के जेष्ठ पुत्र मंडलिक की घोड़ीयों की पूंछ काट दी जब इस बात की सूचना मंडलिक को लगी तो उसने निर्णय लिया कि वह अपने मामा सूजा चौहान पर आक्रमण करेगा मंडलिक अपने भाइयों की सहायता से मामा सूजा चौहान पर आक्रमण करता है और इस आक्रमण में चौहान वंश को जूना बाड़मेर छोड़ने के लिए विवश कर देता है
( बाड़मेर क्षेत्र पर अधिकार करने के कारण यहां के राठौड़ों को बाड़मेरा राठौड़ भी कहते हैं)
जब इस बात की सूचना जगमाल को मिलती है तो वह खुश हो जाता है कि उसके पुत्रों ने जूना बाड़मेर क्षेत्र पर अधिकार कर लिया है जब जगमाल की मृत्यु हो जाती है तब उसके जेष्ठ पुत्र मंडलीक को महेवा रावल बनाया जाता है महेवा का रावल बनते ही मंडलिक अपने अनुज भाई भारमल को जूना बाड़मेर का क्षेत्र दे देता है परंतु भारमल इस क्षेत्र पर अधिकार नहीं करना चाहता था और वह यहां से चला जाता है और भारमल के दोनों पुत्र भी गुजरात के कच्छ की और कुच कर वहां अधिकार कर लेते हैं अब यह जूना बाड़मेर क्षेत्र बिन शासक के सुन पड़ा था तब रावल जगमाल की दूसरी रानी के छोटे पुत्र लूका राठौड़ को क्षेत्र पर अधिकार करने का शुभ अवसर मिल जाता है
लूका राठौड़ का स्थाई अधिकार
लूका राठौड़ के वंशजों ने यहां पर अपना अधिकार स्थाई रूप से कर लिया और लूका राठौड़ के वंशजो ने इस क्षेत्र पर अधिकार भारत के आजाद होने तक किया और वर्तमान में बाड़मेर के रावत त्रिभुवन सिंह राठौड़ है जो लूका राठौड़ के ही वंशज है जब लूका राठौड़ का क्षेत्र पर अधिकार हुआ तब लूका राठौड़ ने अपनी शक्ति को बढ़ाने के लिए तथा अपने इस क्षेत्र पर अधिकार कायम रखने के लिए लूका राठौड़ ने धाधाल , गोगादे , सिंधल आदि राठौड़ों को अपनी सेवा में रखा और सेना में स्थान प्रदान किया सेना की संख्या बढ़ चुकी थी अब आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए लूका राठौड़ ने सिंध क्षेत्र में आक्रमण कर धन प्राप्त किया और सिंध से घोड़ों और धन की बहुत यात से उसकी शक्ति बढ़ गई अब वह अपना अधिकार जूना बाड़मेर पर रख सकता था लूका की मृत्यु के बाद उसके जेष्ठ पुत्र प्रताप सी राठौड़ को जूना बाड़मेर की गद्दी पर बिठाया गया प्रताप सी राठौड़ के बाद उसके जेष्ठ पुत्र जेता राठौड़ का अधिकार जूना बाड़मेर पर हुआ
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जेता राठौड़ के बाद उसके पुत्र चांद राव राठौड़ जूना बाड़मेर पर शासन किया चांद राव राठौर के 2 पुत्र हुए और इन दोनों पुत्रों में जमीन को लेकर विवाद हो गया इस विवाद में विजा राठौड़ की मृत्यु हो जाती है और भीमा राठौड़ को जूना बाड़मेर का शासक बन जाता है
वर्तमान बाड़मेर की स्थापना और दुर्ग निर्माण
वर्तमान बाड़मेर की स्थापना चांद राव राठौड़ के पुत्र भीमा राठौड़ ने की थी जूना बाड़मेर का क्षेत्र शत्रुओं के आक्रमण का केंद्र बना रहता था इसलिए भीमा ने अपना शासन बापड़ाउ पर कायम किया और इसी बापड़ाउ के स्थान पर उसने बाड़मेर को बसाया रावत भीमा राठौड़ ने 1552 ईस्वी में 1300 से ज्यादा मीटर ऊंची पहाड़ी पर गढ़ का निर्माण करवाया जिसका नाम किलोणगढ़ दुर्ग रखा
भीमा राठौड़ का पराक्रम
भीमा राठौड़ वीर व शक्तिशाली शासक था उसकी शक्ति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब जोधपुर के शासक मालदेव ने फलोदी पर आक्रमण किया और इसकी सूचना भीमा राठौड़ को लगी तब शासक भीमा राठोड़ ने 400 से 500 अश्वरोहियो की सेना फलोदी के शासक जैतमाल की सहायता में भेजी शासक भीमा राठौड़ की सेना ने मालदेव की सेना को काफी नुकसान पहुंचाया
बाड़मेर के शासक भीमा राठौड़ ने राजा मालदेव के विरुद्ध जैसलमेर के भाटियों का साथ दिया इन सभी कारणों से मालदेव ने अपनी एक सेना बाड़मेर पर आक्रमण करने के लिए भेजी मालदेव की सेना भैरव दास और पृथ्वीराज जैतावत की अगुवाई में बाड़मेर पर आक्रमण करने के लिए भेजी इस युद्ध में पृथ्वीराज जैतावत द्वारा बरसी का वार करने से भीमा राठोड़ घायल हो गया और उसको ठाकुरों द्वारा जैसलमेर की ओर ले जाया गया
जैसलमेर में भीमा राठौड़ ने अपनी सैनिक शक्ति को बढ़ाया और बाड़मेर पर अधिकार करने के लिए आक्रमण कर दिया जब भीमा राठौड़ ने बाड़मेर पर आक्रमण किया तब बाड़मेर पर रतन सिंह राठौड़ को मालदेव ने नियुक्त कर रखा था परंतु भीमा राठौड़ के वार से मालदेव के नियुक्त अधिकारी हार गए और वहां से वापस मारवाड़ जोधपुर की ओर चले गए और भीमा राठौड़ का बाड़मेर पर अधिकार हो गया मालदेव का जोधपुर , पोकरण , शिवाना और जालौर आदि के क्षेत्रों पर स्थाई अधिकार था परंतु बाड़मेर पर उसका स्थाई अधिकार नहीं हो पाया
भीमा राठौड़ के बाद उसके पुत्र कल्ला राठौड़ उत्तराधिकारी बने कल्ला राठौड़ के उत्तराधिकारी बनने के बाद बाड़मेर की गद्दी को लेकर मारकाट का दौर अपने ही भाइयों में चलता रहा थोड़े-थोड़े समय में यहां कई शासक बने परंतु बदले और प्रति शोध की भावना के कारण यहां अपने भाइयोंं का रक्त बहाकर शासक बनते चले गए इसी मारकाट से यहां के राठौड़ों की शक्ति कमजोर होती गई और इनकी होती कमजोर शक्ति का फायदा जैसलमेर रियासत और जोधपुर रियासत को हुआ
जब बाड़मेर के शासक रामचंद्र जी राठौड़ थे तब उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह जैसलमेर के महा रावल अखेराज से किया
भारो जी राठौड़ के पुत्र साहब जी राठौड़ ने शासक रामचंद्र जी राठौड़ की हत्या कर दी और अपने पिता जी को बाड़मेर का शासक बना दिया जब इस बात की सूचना रामचंद्र जी राठौड़ की बेटी को लगी तो रामचंद्र राठौड़ की बेटी और महारावल अखेराज की रानी ने अखेराज को पिता का प्रतिशोध लेने के लिए मना लिया एक योजना बनाई और इस योजना के अनुसार जैसलमेर रियासत की सेना विशाला गांव की सीमा तक पहुंच गई और वहां रुकी तब साहब जी राठौड़ को हरनाथ भाटी द्वारा विशाला गांव में लाया जाता है और उन्हें रामचंद्र जी राठौड़ की हत्या की बात याद दिला कर उनका वध कर दिया जाता है
जब बाड़मेर के शासक भारो जी राठौड़ बने थे तब उनके पांच पुत्र थे इन पांच पुत्रों में सबसे बड़े पुत्र का नाम साहब जी राठौड़ था जिनकी मृत्यु भारो जी राठौड़ के रहते हुए हो गई थी इसलिए उनके छोटे पुत्र लालचंद जी राठौड़ को भारो जी राठौड़ का उत्तराधिकारी बनाया गया
भारो जी के 5 पुत्र : (1)साहब जी राठौड़
(2) किशन दास जी राठौड़
(3) लाल चंद जी राठौड़
(4) पबो जी राठौड़
(5) खीमो जी राठौड़
(भारो जी के इन वंशजों को भाराणी भी कहते हैं)
साहब जी राठौड़ को विशाला ग्राम में धोखे से बुलाकर हत्या कर दी गई इस हत्या का प्रतिशोध और बदला लेने के लिए भारानी भाइयों ने जैसलमेर पर आक्रमण कर दिया इस आक्रमण से जैसलमेर को आर्थिक रूप से काफी नुकसान पहुंचाया और रियासत में लूटमार की परंतु हत्यारे का दमन करने में असफल रहे इस असफलता के बाद आखिर लालचंद जी राठौड़ के पोत्र और कान सिंह के पुत्र पदम सिंह ने साहब जी राठौड़ का बदला लेने का निश्चय किया पदम सिंह राठौड़ ने हरनाथ सिंह भाटी जिन्होंने साहब जी राठौड़ का वध किया था को उनके गांव बीकमपुर जाकर उनका वध कर दिया और इसी के साथ ही प्रतिशोध की जलती ज्वाला अब मन को शांति प्रदान कर रही थी इस घटना के बाद पदम सिंह राठौड़ के बारे में एक दोहा कहा जाता है -
भारो जी राठौड़ ने उत्तराधिकारी के लिए हुए संघर्ष और मारकाट को देख चुके थे इसलिए भारो जी राठौड़ ने अपने जीवित रहते बाड़मेर के क्षेत्र को अपने पांच पुत्रों के बीच बांट दिया और अपने पुत्र लालचंद जी राठौड़़ को अपना उत्तराधिकारी बनाया इस प्रकार बांटे गए क्षेत्र में इनके पुत्रों ने पांच कोटडी यो का निर्माण किया
( बाड़मेर के शासकों को रावत की उपाधि थी)
(2) लाल चंद जी राठौड़ की जागीर में आए 8 गांव निम्नलिखित है - सरली , उत्तरलाई , गंगासरिया आदि गांव
(3) किशन दास जी राठौड़ की जागीर में आए 8 गांव निम्नलिखित हैं - भुरटिया , कुड़ला , शिवकर , बाड़मेर आगोर , कवास , बाड़मेर नगर आदि गांव
(4) पबो जी राठौड़ की जागीर में आए 6 गांव निम्नलिखित हैं - रामदेरिया , हाथीतला ,डीगड़ा आदि गांव
(5) खीमो जी राठौड़ की जागीर में आए 6 गांव निम्नलिखित है - गरल , जालीपा आदि गांव
अन्य छूट भाइयों के 12 गांव और सासन व डोली आदि के 8 गांव रखे गए
( गांव की सीमा का निर्धारण भी कर दिया गया जिससे कि आगे कोई कलह ना हो )
साहब जी राठौड़ को विशाला ग्राम में धोखे से बुलाकर हत्या कर दी गई इस हत्या का प्रतिशोध और बदला लेने के लिए भारानी भाइयों ने जैसलमेर पर आक्रमण कर दिया इस आक्रमण से जैसलमेर को आर्थिक रूप से काफी नुकसान पहुंचाया और रियासत में लूटमार की परंतु हत्यारे का दमन करने में असफल रहे इस असफलता के बाद आखिर लालचंद जी राठौड़ के पोत्र और कान सिंह के पुत्र पदम सिंह ने साहब जी राठौड़ का बदला लेने का निश्चय किया पदम सिंह राठौड़ ने हरनाथ सिंह भाटी जिन्होंने साहब जी राठौड़ का वध किया था को उनके गांव बीकमपुर जाकर उनका वध कर दिया और इसी के साथ ही प्रतिशोध की जलती ज्वाला अब मन को शांति प्रदान कर रही थी इस घटना के बाद पदम सिंह राठौड़ के बारे में एक दोहा कहा जाता है -
"बीकमपुर रे बांक , कील पूरे बल काढीयो
छत्रों मनावो सोक , पदम महल पधारियो"
भारो जी राठौड़ ने उत्तराधिकारी के लिए हुए संघर्ष और मारकाट को देख चुके थे इसलिए भारो जी राठौड़ ने अपने जीवित रहते बाड़मेर के क्षेत्र को अपने पांच पुत्रों के बीच बांट दिया और अपने पुत्र लालचंद जी राठौड़़ को अपना उत्तराधिकारी बनाया इस प्रकार बांटे गए क्षेत्र में इनके पुत्रों ने पांच कोटडी यो का निर्माण किया
( बाड़मेर के शासकों को रावत की उपाधि थी)
भारो जी राठौर के पांच पुत्रों को जागीर के बंट में मिले क्षेत्र -
(1) साहब जी राठौड़ की जागीर के बंट मे आए 12 गांव निम्नलिखित है - चोखला , तारातरा , सीरावड़ा , कपूरडी , रोहिली , लूनू , चूली , गुड़ी सर आदि गांव(2) लाल चंद जी राठौड़ की जागीर में आए 8 गांव निम्नलिखित है - सरली , उत्तरलाई , गंगासरिया आदि गांव
(3) किशन दास जी राठौड़ की जागीर में आए 8 गांव निम्नलिखित हैं - भुरटिया , कुड़ला , शिवकर , बाड़मेर आगोर , कवास , बाड़मेर नगर आदि गांव
(4) पबो जी राठौड़ की जागीर में आए 6 गांव निम्नलिखित हैं - रामदेरिया , हाथीतला ,डीगड़ा आदि गांव
(5) खीमो जी राठौड़ की जागीर में आए 6 गांव निम्नलिखित है - गरल , जालीपा आदि गांव
अन्य छूट भाइयों के 12 गांव और सासन व डोली आदि के 8 गांव रखे गए
( गांव की सीमा का निर्धारण भी कर दिया गया जिससे कि आगे कोई कलह ना हो )
अंग्रेजों का हस्तक्षेप
अन्य रियासतों की तरह कलह का दौर यहां पर जारी रहा जिसका फायदा अंग्रेजों को मिला
जैसलमेर के महारावल अखेराज ने ब्रिटिश सरकार और राजा मानसिंह से बाड़मेर के राठौड़ों की शिकायत की और इनको सजा देने की मांग रखी ओर दूसरी तरफ अंग्रेजों ने भी मालाणी परगने के प्रबंध की बात जोधपुर राजा मानसिंह के समक्ष रखी जोधपुर के महाराजा इन बातोंं को नजरअंदाज करते रहे और उधर बाड़मेर के शासकों के बीच आपसी कलह का दौर जारी रहा इन सब बातों का फायदा ब्रिटिश सरकार के अंग्रेजों ने उठाया और उन्होंने 1835 में डीसा और एरिनपुरा की सैनिकों द्वारा बाड़मेर और चौहटन पर एक साथ आक्रमण कर दिया इस आक्रमण में बाड़मेर के रावत वभूत सिंह बड़ी वीरता पूर्वक लड़े परंतु अंत में यहां पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया और यहां के ठाकुरों को पकड़ लिया और उनको गुजरात के राजकोट लेकर गए राव दल जी की गवाही पर उनको छोड़ दिया गया अब यहां के शासक अंग्रेजों की जंजीरों में जकड़ चुके थे इन सबके बीच भी बाड़मेर में एक शासक के बाद दूसरा शासक बनते रहे और यहांं के शासकों को रावत की उपाधि है, जब भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ तब बाड़मेर को राजस्थान राज्य का जिला बना दिया गया वर्तमान समय में भी विभिन्न ठिकानों में सिद्ध पुरुष मल्लिनाथ जी के वंशज निवास करते हैं
2 comments
Click here for commentsBahut sandar hukm
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