Bhati Dynasty | भाटी राजवंश
महाभारत का युद्ध जिसमें श्री कृष्ण ने पांडवों के पक्ष में लड़ते हुए पांडवों को कौरवों की सेना पर विजय दिलाई आज हम बात करेंगे श्री कृष्ण के वंशज जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों पर शासन किया और वर्तमान समय में भी श्री कृष्ण के वंशज भारत और पाकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों मे निवास करते हैं ये श्री कृष्ण को अपना मूल पुरुष मानते हैं जब भट्टी शासक बने तो उनके आने वाले वंशजों ने अपने नाम के पीछे भट्टी लगाना शुरू कर दिया जो समय के अनुसार अपभ्रंश होकर भाटी बन गया यह भाटी शासक अपने को श्री कृष्ण के वंशज और चंद्रवंशी मानते हैं
285 ईसवी में राजा बलंद के पुत्र भट्टी ने भटनेर नगर बसाया परंतु राजा बलंद और उनके पूर्वजों का वर्तमान पंजाब ( भारत-पाकिस्तान ) , सिंध और उसके आसपास के क्षेत्रों पर अधिकार था राजा भट्टी ने 285 ईस्वी में भटनेर नगर बसाया और अपने राज्य को सुरक्षित रखने के लिए 288 ईसवी में भटनेर दुर्ग का निर्माण करवाया
भटनेर दुर्ग को उत्तर भड़ किवाड़ भी कहते हैं क्योंकि उस समय उत्तर से होने वाले शत्रुओं के आक्रमण को यह दुर्ग रोकता था अर्थात एक किवाड़ (दरवाजा) की भाति यह अपने शत्रुओं को भारतीय भूमि में प्रवेश होने से रोकता था और इस दुर्ग में भाटी राजवंश का शासन था तो यहां के भाटी शासक उत्तर से आने वाले आक्रमणकारियों से भीड़ जाते थे इस कारण यहां के शासक उत्तर भड़ किवाड़ भाटी कहलाए भटनेर दुर्ग को तैमूर लंग ने जीता था और उसने अपनी आत्मकथा तुझके ए तैमूरी में इस दुर्ग के बारे में लिखा की यह दुर्ग शक्तिशाली दुर्ग हैं
राजा भट्टी की मृत्यु के बाद यहां का शासक उसका पुत्र मंगल बना और मंगल के समय गजनी के शासक धुंडी ने आक्रमण किया और इस आक्रमण में राजा मंगल की पराजय हुई और इस पराजय के बाद मंगल के पुत्र मंजस राव ने रेगिस्तान की ओर प्रस्थान किया
मंजस राव के बाद भाटी वंश में कई राजा बने
12 वीं शताब्दी में राजा भोज के पुत्र जैसल ने जैसलमेर नगर बसाया 1155 ईस्वी में जैसल देव भाटी ने जैसलमेर दुर्ग की नींव रखी और उसके पुत्र शालीवाहन ने इस दुर्ग को पूर्ण करवाया यह दुर्ग विशाल और भव्य बनाया गया ताकि यहां के शासक शत्रुओं के आक्रमण के समय रियासत की जनता को दुर्ग के अंदर सुरक्षित रख सके
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| महारावल जैसल |
1275 में जैसलमेर की गद्दी पर जैत्र सिंह बैठे और उस समय दिल्ली पर खिलजी वंश के अलाउद्दीन खिलजी का शासन था जैत्र सिंह के 2 पुत्र थे उनके बड़े पुत्र का नाम मूलराज और दूसरे पुत्र का नाम रतन सिंह था जैत्र सिंह के दोनों पुत्र बड़े वीर और बलशाली थे महारावल जैत्र सिंह के वीर पुत्रों ने मिलकर मुल्तान थट्टा से आने वाला खजाना लूट लिया यह खजाना दिल्ली ले जाया जा रहा था जब इसकी सूचना अलाउद्दीन खिलजी को लगी तो उसने तुरंत निश्चय किया कि वह अपनी सेना लेकर जैसलमेर पर आक्रमण करेगा
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जैसलमेर दुर्ग का विवाह
मूलराज जब जैसलमेर के महारावल बने तब उन्होंने निश्चय किया था कि वह इस दुर्ग का विवाह अवश्य करेंगे अर्थात दुर्ग के विवाह से अभिप्राय है कि जब किसी दुर्ग मे जोहर और पुरुषों द्वारा केसरिया किया जाता है
दिल्ली से अलाउद्दीन खिलजी का सेनापति अपनी सेना को लेकर जैसलमेर सियासत की ओर बढ़ता चला आया अलाउद्दीन की सेना ने जैसलमेर के स्वर्ण गिरी दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया यह घेरा कई महीनों तक रहा रेगिस्तान की इस जुलूसती गर्मी और हड्डियों को जमा देने वाली ठंड में खिलजी सेना को वापस दिल्ली जाने के लिए मजबूर कर दिया परंतु मूलराज के भाई रतन सिंह को इसकी सूचना मिली की खिलजी की सेना बिना युद्ध लड़े वापिस दिल्ली की ओर जाने वाली है तब रतन सिंह ने यह खबर महारावल और अपने बड़े भाई मूलराज को दी तब मूलराज ने निश्चय किया कि यह अवसर नहीं जाने देंगे और किले का विवाह अवश्य होगा यह सब सुनते ही रतन सिंह ने सेना को आदेश दिया की अगली सुबह किले के दरवाजे खोल दिए जाए और शत्रु सेना को दूत द्वारा संदेश भेजा गया की अगली सुबह किले के दरवाजे खुले होंगे तुम अपनी सेना को आक्रमण करने के लिए कह देना यह सब सुनते ही अलाउद्दीन का सेनापति खुशी से हंसने लगा और अपनी सेना को अगली सुबह युद्ध के लिए तैयार रहने के लिए आदेश दे दिया
जैसलमेर का प्रथम साका
सूर्य की पहली किरण के साथ महारावल मूलराज की सेना हर हर महादेव और जय भवानी के नारों के साथ शत्रु सेना पर टूट पड़ी महारावल मूलराज , रतन सिंह और वीर भाटी योद्धा लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और किले के अंदर महारानी के नेतृत्व में रानियों ने जोहर किया और यह जैसलमेर का पहला साका था इस के बाद अब जैसलमेर का दुर्ग चित्तौड़गढ़ दुर्ग और रणथंबोर दुर्ग की भांति विवाह के बंधन में बंध चुका था अब इस दुर्ग को कोई कुंवारा नहीं कह सकता था भाटियों ने अपने शौर्य बल से इस दुर्ग को विवाह के बंधन में बंधा दिया था
जैसलमेर के प्रथम साके के बाद मूलराज का पुत्र दुदा वापिस जैसलमेर का राजा बनना चाहता था लेकिन रतन सिंह के पुत्र गढ़सी ने अलाउद्दीन खिलजी से विश्वास हासिल कर लिया और वह जैसलमेर का महारावल बन गया महारावल गढ़सी ने गडसीसर सरोवर का निर्माण करवाया
महारावल दूदा का पराक्रम और जैसलमेर का दूसरा साका
महारावल गढ़सी की मृत्यु के बाद मूलराज का पुत्र दुदा जैसलमेर का शासक बना महारावल दूदा जब जैसलमेर के शासक थे तब उस समय दिल्ली पर फिरोजशाह तुगलक का अधिकार था महारावल दूदा के शासक बनते ही दिल्ली के शासक फिरोजशाह तुगलक ने अपनी सेना को जैसलमेर पर आक्रमण करने के लिए भेजा इस आक्रमण का जवाब महारावल दूदा ने बड़ी वीरता से देते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और वीरांगनाओं ने जोहर किया यह जैसलमेर का दूसरा साका था
जैसलमेर का दुर्ग अपनी स्वर्ण काया से भाटियों के शौर्य को इन 2 साको में देख चुका था
महारावल दूदा के बाद कई शासक बने परंतु दिल्ली के शासकों ने अब जैसलमेर पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं हुई समय का कालचक्र चलता गया और अपने साथ इतिहास बनाता गया सन 1550 का जब जैसलमेर रियासत के महारावल बने लूणकरण भाटी
आमिर खा का विश्वासघात और अर्द्ध साका
महारावल लूणकरण की वीरता को देखते हुए कंधार के शासक ने जैसलमेर पर अधिकार करने की एक कायर पूर्ण रणनीति बनाई कंधार के शासक ने अपने सेनापति अमीर खां को महारावल लूणकरण के यहां भेजा और रणनीति के हिसाब से अमीर खान ने महारावल से प्रार्थना की की आप मुझे अपनी शरण में जगह प्रदान करें नहीं तो कंधार का शासक मुझे मार डालेगा शरणागत की रक्षा करना राजपूत अपना कर्तव्य मानते थे
आमिर खां अपने साथ कई सैनिकों को महिला की वेशभूषा में किले के अंदर ले आया और रात्रि को अचानक से आक्रमण कर दिया इस आक्रमण का पता जब महारावल लूणकरण भाटी लगा तो उन्होंने इस आक्रमण के लिए बिना तैयारी के ही युद्ध करने का निश्चय किया वीर भाटी सिरदारो ने सबसे पहले अपनी रानियों के सर अपनी तलवार से अलग किए और फिर शत्रु सेना पर टूट पड़े अचानक हुए आक्रमण में भाटी योद्धा लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए इतिहास में इस युद्ध को आधा साका कह कर संबोधित किया जाता है क्योंकि इसमें भाटियों ने केसरिया तो किया लेकिन रानियों को जोहर करने का अवसर नहीं मिला
त्रिकूट गढ़ अपनी आंखों से भाटियों का रण कौशल और शौर्य देख चुका था इतिहास में जैसलमेर यह दुर्ग ढाई साको के लिए प्रसिद्ध है


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