Maharana pratap | महाराणा प्रताप | हिंदू आ सूरज | मेवाड़ रत्न
राजपूताने की ऐसी रियासत जिसका राजवंश प्राचीनतम राजवंशों में से एक है जिसके राजाओं ने अपने रण कौशल से अपना पराक्रम दसों दिशाओं तक फैलाया हम बात कर रहे हैं राजपूताने के दक्षिण में स्थित ऐसी रियासत की जिसमें एक से बढ़कर एक वीरवर राजा हुए जिन्होंने अपने देश , धर्म , संस्कृति , प्रजा और स्वाभिमान की रक्षा के लिए वनों की घास की रोटी खाना स्वीकार किया परंतु किसी की गुलामी स्वीकार नहीं की ऐसे वीर राजा मेवाड़ की रियासत में हुए जिसमें बप्पा रावल ,रावल जेत्र सिंह , रावल तेज सिंह , रावल रतन सिंह , महाराणा कुंभा, महाराणा सांगा , महाराणा उदय सिंह , महाराणा प्रताप , महाराणा राज सिंह आदि राजपूत राजाओ ने जन्म लिया था
पिता - महाराणा उदय सिंह
माता - रानी जयवंता बाई
कुंवर प्रताप को प्यार से कीका बुलाते थे क्योंकि प्रताप छोटी सी उम्र में प्रजा और जंगल में निवास कर रहे भीलो से प्रसन्नता पूर्वक मिलते थे और संकट की घड़ी में इनकी सहायता करने को तत्पर रहते थे और इस कारण वे प्रजा के लिए हितेषी बन गए
प्रजा प्रेम ने प्रताप को भावी राजा के रूप में स्वीकार करने की इच्छा जाहिर की थी परंतु महाराणा उदय सिंह की प्रिय भटियाणी रानी के प्रेम में उदय सिंह ने जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था
महाराणा उदय सिंह के समय दिल्ली के शासक अकबर ने 1567 -68 में चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया था सरदारों के कहने पर महाराणा उदय सिंह को परिवार सहित उदयपुर भेज दिया और किले का दारोमदार जयमल राठौड़ , वीर कल्ला राठौड़ एवं पत्ता सिसोदिया को सौंप दिया इस आक्रमण का मुकाबला राजपूत सरदारों ने बड़ी वीरता पूर्वक किया और शत्रु दल की संख्या लाखों की संख्या में होने के कारण राजपूत सरदार बड़ी वीरता से लड़ते हुए केसरिया किया और वीरगति को प्राप्त हुए रानी फूल कंवर के नेतृत्व में जोहर किया और यह मेवाड़ का तीसरा साका था
🌟 CLICK HERE : मारवाड़ क्षेत्र के बाड़मेर परगने का इतिहास - Rathore Dynasty of Barmer
युद्ध के उपरांत अकबर ने यहां की प्रजा का कत्लेआम करवाया और धन संपदा को लूट कर वापस दिल्ली चला गया
महाराणा उदय सिंह की मृत्यु के बाद सामंतों ने कुंवर प्रताप को राजा घोषित कर दिया परंतु उदय सिंह ने कुंवर जगमाल को उत्तराधिकार घोषित किया था सामंतो द्वारा कुंवर प्रताप को राजा घोषित करने के बाद कुंवर जगमाल अकबर की शरण में चले गए और अकबर ने उन्हें कई जागीरे दी कुंवर जगमाल दत्तानी के युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे
मेवाड़ के कुंवर प्रताप का विवाह बिजोलिया ठिकाने की अजब्दे पवार से हुआ और इनके बेटे का नाम अमर सिंह था
चेतक : महाराणा प्रताप के घोड़े का नाम चेतक था जो युद्ध मैदान में हाथी की सूंड लगा कर युद्ध करने में पारंगत था जिससे युद्ध मैदान में हाथी और अन्य घोड़े भयभीत हो जाते थे चेतक को महाराणा प्रताप ने अफगानिस्तान के एक व्यापारी से खरीदा था
छापामार युद्ध पद्धति : छापामार युद्ध पद्धति की शुरुआत सबसे पहले महाराणा उदय सिंह ने की थी उसके बाद इस युद्ध पद्धति का अनुसरण उनके पुत्र महाराणा प्रताप ने भी किया और इस पद्धति द्वारा महाराणा प्रताप को विजय भी प्राप्त हुई
महाराणा प्रताप की प्रतिज्ञा : महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक सामंतों द्वारा करवाया गया और महाराणा प्रताप ने यह प्रतिज्ञा ली की जब तक चित्तौड़गढ़ को मुगलों से आजाद नहीं कर लेते तब तक वह वन में रहेंगे और साधारण जनता की तरह जीवन यापन करेंगे
अकबर की कूटनीतिक चाल : अकबर ने विभिन्न कूटनीतिक चालों द्वारा महाराणा प्रताप को अपने अधीन करने के लिए विभिन्न प्रलोभन दिया परंतु ये प्रलोभन भी महाराणा प्रताप के स्वाभिमान को नहीं झुका सके और महाराणा प्रताप का इरादा और भी ज्यादा मजबूत होता चला गया
चार दूत : (1) अकबर ने समय-समय पर महाराणा प्रताप के पास चार दूत भेजें जिनका लक्ष्य था महाराणा प्रताप को अकबर के अधीन करना अर्थात उनकी स्वतंत्रता को समाप्त करना इन दूतो में सबसे पहले जलाल खां को 1572 में भेजा जो असफल रहा
(2) जलाल खान कोर्ची के असफल होने के बाद अकबर ने आमेर कुंवर मानसिंह को 1573 में महाराणा प्रताप के पास समझाइश के लिए भेजा
भोजन वार्ता: जब मान सिंह को राणा प्रताप के पास आए तो महाराणा प्रताप ने उनको शाम के भोजन ग्रहण करने के लिए रुकने को कहा तो शाम के समय भोजन ग्रहण करने महाराणा प्रताप के कुंवर अमर सिंह आए इससे मानसिंह नाराज हो गए और उन्होंने इसे अपना अपमान समझा और वापिस अकबर के पास चले गए
(3) जब मानसिंह भी असफल होकर वापस लौटे तो अकबर ने आमेर नरेश भगवंत दास को 1573 में गोगुंदा भेजा महाराणा प्रताप को अधीनता स्वीकार कराने के लिए परंतु स्वाभिमान के प्रतीक महाराणा कहां झुकना स्वीकार करते
(4) अंतिम दूत के रूप में अकबर ने टोडरमल को दिसंबर 1573 में गोगुंदा महाराणा प्रताप के पास भेजा
🌟 उपरोक्त चारों दूतों के असफल होने के बाद अकबर ने युद्ध के लिए तैयारी शुरू कर दी और इधर महाराणा अपने सामंतों को समझाने लगे कि अब युद्ध होने ही वाला है इसलिए हमें पूर्ण रूप से युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए
हल्दीघाटी का युद्ध : हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 को महाराणा प्रताप और अकबर प्रतिनिधि मानसिंह के मध्य हुआ इस युद्ध में जहां महाराणा प्रताप की सेना संख्या 20000 थी तो वही मानसिंह के पास 80000 की विशाल सेना थी इस युद्ध में महाराणा प्रताप के सेनापति हकीम खां सूरी थे जोकि हरावल दस्ते का प्रतिनिधि कर रहे थे और राणा पूंजा भील जोकि चंद्रावल दस्ते का प्रतिनिधि कर रहे थे
हरावल : सेना का अग्रिम भाग जो कि सबसे पहले आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ता है
चंद्रावल : सेना का पिछला भाग जो सेना पर नजर बनाए रखता है
🌟 मेवाड़ के भामाशाह द्वारा महाराणा प्रताप को स्वर्ण मुद्राएं दी जिससे महाराणा प्रताप ने आगामी 20 वर्ष तक मेवाड़ की रक्षा के लिए सेना का गठन किया और उन सैनिकों को वेतन भी दिया
महाराणा का वार : महाराणा प्रताप ने मानसिंह को उसके मर्दा ने हाथी पर बैठा हुआ देखा और अपने घोड़े चेतक को आगे की ओर बढ़ाया घोड़े को आगे बढ़ता देख मानसिंह घबरा गए और महाराणा प्रताप ने अपना भाला मानसिंह की ओर पूरी शक्ति के साथ फेंका मानसिंह ओहदे में छुप गए और भाला गज संचालन को भेदता हुआ ओहदे से जा भिड़ा इस भीषण वार से मानसिंह हाथी से नीचे गिर पड़े और हाथी की सूंड पर लगी तलवारों से चेतक के पांव पर गहरा घाव लग गया जिससे चेतक घायल हो गया था
चेतक का पराक्रम : युद्ध में घायल चेतक को भी यह मालूम था कि अपने मालिक को किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना है इसलिए जब महाराणा को सभी सरदारों ने युद्ध से बाहर निकलने के लिए विवश किया तब घायल चेतक पवन वेग की रफ्तार से कुछ इस तरह आगे बढ़ता गया और पीछे आ रहे दुश्मनों को पीछे छोड़ दिया और महाराणा को 20 फीट के नाले को छलांग लगाकर पार करा दिया और वहीं पर घायल चेतक ने अपने प्राण त्याग दिए
भरत मिलाप जैसा दृश्य : जब महाराणा घायल चेतक के पास बैठे थे तब महाराणा प्रताप का छोटा भाई शक्ति सिंह उनसे मिलने आया और महाराणा प्रताप और शक्ति सिंह कई वर्षों बाद मिले तो एक दूसरे को गले से लगाया और दोनों के आंखों से अश्रु धारा बहने लगी यह मिलन रामायण में राम और भरत के मिलन जैसा था
हल्दीघाटी में महाराणा की विजय :हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की विजय होती है क्योंकि अकबर ने मानसिंह को यह आदेश दिया था कि वह किसी भी तरह महाराणा प्रताप को जीवित या मृत रूप से अपने पास लेकर आए इसमें मानसिंह असफल रहे और इससे नाराज होकर अकबर ने मानसिंह को अपने इबादत खाने में आने से मना कर दिया
महाराणा प्रताप का विजई अभियान : राणा प्रताप ने 1582 के दिवेर युद्ध से अपना विजई अभियान शुरू किया और इसके बाद उन्होंने मेवाड़ के कई स्थानों को मुगल चुंगल से आजाद करवाया
अघोषित संधि काल (1584-1597) : महाराणा की शक्ति और शौर्य को देखकर अकबर भयभीत हो गया था और उसे रात के सपनों में भी महाराणा प्रताप दिखाई देने लगे इसलिए अकबर ने 1584 से लेकर महाराणा के देव लोक गमन तक कोई भी आक्रमण मेवाड़ पर नहीं किया
बलशाली महाराणा : (1) महाराणा प्रताप बाहुबल अर्थात शक्ति और शौर्य के धनी थे जब वह युद्ध मैदान में जाते थे तो अपने साथ 80 किलो का भाला लेकर जाते थे
(2) महाराणा प्रताप 250 किलो के लोहे के कवच आभूषण पहनकर युद्ध मैदान में जाते थे
(3) बाल्यावस्था में महाराणा प्रताप ने एक जंगली शेर को भुजबल से मार गिराया और प्रजा को उसके आतंक से मुक्त कराया
(4) राणा प्रताप ने हल्दीघाटी के युद्ध मैदान में बहलोल खान को एक ही वार में घोड़े सहित दो हिस्सों में काट दिया था
महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के सभी क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था और चित्तौड़ को मुगलों के चंगुल से आजाद कराने के लिए अभियान पर निकले ही थे परंतु जब महाराणा प्रताप जंगल में धनुष की डोर चढ़ा रहे थे तब उनकी आंतरिक चोट और गहरी हो गई और महाराणा प्रताप 1597 को देवलोक गमन हो गए
अकबर भी रोया : महाराणा प्रताप की अंत्येष्टि के समाचार अकबर को मिले तो एक पल भर के लिए अकबर की आंखों में भी आंसू आ गए
बात है 9 मई 1540 (विक्रम संवत 25 मई 1540) कुंभलगढ़ के किले में एक शिशु का जन्म हुआ जो आगे चलकर हिंदू आ सूरज कहलाया और इस शिशु का नाम कुंवर प्रताप रखा
पिता - महाराणा उदय सिंह
माता - रानी जयवंता बाई
कुंवर प्रताप को प्यार से कीका बुलाते थे क्योंकि प्रताप छोटी सी उम्र में प्रजा और जंगल में निवास कर रहे भीलो से प्रसन्नता पूर्वक मिलते थे और संकट की घड़ी में इनकी सहायता करने को तत्पर रहते थे और इस कारण वे प्रजा के लिए हितेषी बन गए
प्रजा प्रेम ने प्रताप को भावी राजा के रूप में स्वीकार करने की इच्छा जाहिर की थी परंतु महाराणा उदय सिंह की प्रिय भटियाणी रानी के प्रेम में उदय सिंह ने जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था
महाराणा उदय सिंह के समय दिल्ली के शासक अकबर ने 1567 -68 में चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया था सरदारों के कहने पर महाराणा उदय सिंह को परिवार सहित उदयपुर भेज दिया और किले का दारोमदार जयमल राठौड़ , वीर कल्ला राठौड़ एवं पत्ता सिसोदिया को सौंप दिया इस आक्रमण का मुकाबला राजपूत सरदारों ने बड़ी वीरता पूर्वक किया और शत्रु दल की संख्या लाखों की संख्या में होने के कारण राजपूत सरदार बड़ी वीरता से लड़ते हुए केसरिया किया और वीरगति को प्राप्त हुए रानी फूल कंवर के नेतृत्व में जोहर किया और यह मेवाड़ का तीसरा साका था
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युद्ध के उपरांत अकबर ने यहां की प्रजा का कत्लेआम करवाया और धन संपदा को लूट कर वापस दिल्ली चला गया
महाराणा उदय सिंह की मृत्यु के बाद सामंतों ने कुंवर प्रताप को राजा घोषित कर दिया परंतु उदय सिंह ने कुंवर जगमाल को उत्तराधिकार घोषित किया था सामंतो द्वारा कुंवर प्रताप को राजा घोषित करने के बाद कुंवर जगमाल अकबर की शरण में चले गए और अकबर ने उन्हें कई जागीरे दी कुंवर जगमाल दत्तानी के युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे
मेवाड़ के कुंवर प्रताप का विवाह बिजोलिया ठिकाने की अजब्दे पवार से हुआ और इनके बेटे का नाम अमर सिंह था
चेतक : महाराणा प्रताप के घोड़े का नाम चेतक था जो युद्ध मैदान में हाथी की सूंड लगा कर युद्ध करने में पारंगत था जिससे युद्ध मैदान में हाथी और अन्य घोड़े भयभीत हो जाते थे चेतक को महाराणा प्रताप ने अफगानिस्तान के एक व्यापारी से खरीदा था
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| महाराणा प्रताप का स्मारक |
छापामार युद्ध पद्धति : छापामार युद्ध पद्धति की शुरुआत सबसे पहले महाराणा उदय सिंह ने की थी उसके बाद इस युद्ध पद्धति का अनुसरण उनके पुत्र महाराणा प्रताप ने भी किया और इस पद्धति द्वारा महाराणा प्रताप को विजय भी प्राप्त हुई
महाराणा प्रताप की प्रतिज्ञा : महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक सामंतों द्वारा करवाया गया और महाराणा प्रताप ने यह प्रतिज्ञा ली की जब तक चित्तौड़गढ़ को मुगलों से आजाद नहीं कर लेते तब तक वह वन में रहेंगे और साधारण जनता की तरह जीवन यापन करेंगे
अकबर की कूटनीतिक चाल : अकबर ने विभिन्न कूटनीतिक चालों द्वारा महाराणा प्रताप को अपने अधीन करने के लिए विभिन्न प्रलोभन दिया परंतु ये प्रलोभन भी महाराणा प्रताप के स्वाभिमान को नहीं झुका सके और महाराणा प्रताप का इरादा और भी ज्यादा मजबूत होता चला गया
चार दूत : (1) अकबर ने समय-समय पर महाराणा प्रताप के पास चार दूत भेजें जिनका लक्ष्य था महाराणा प्रताप को अकबर के अधीन करना अर्थात उनकी स्वतंत्रता को समाप्त करना इन दूतो में सबसे पहले जलाल खां को 1572 में भेजा जो असफल रहा
(2) जलाल खान कोर्ची के असफल होने के बाद अकबर ने आमेर कुंवर मानसिंह को 1573 में महाराणा प्रताप के पास समझाइश के लिए भेजा
भोजन वार्ता: जब मान सिंह को राणा प्रताप के पास आए तो महाराणा प्रताप ने उनको शाम के भोजन ग्रहण करने के लिए रुकने को कहा तो शाम के समय भोजन ग्रहण करने महाराणा प्रताप के कुंवर अमर सिंह आए इससे मानसिंह नाराज हो गए और उन्होंने इसे अपना अपमान समझा और वापिस अकबर के पास चले गए
(3) जब मानसिंह भी असफल होकर वापस लौटे तो अकबर ने आमेर नरेश भगवंत दास को 1573 में गोगुंदा भेजा महाराणा प्रताप को अधीनता स्वीकार कराने के लिए परंतु स्वाभिमान के प्रतीक महाराणा कहां झुकना स्वीकार करते
(4) अंतिम दूत के रूप में अकबर ने टोडरमल को दिसंबर 1573 में गोगुंदा महाराणा प्रताप के पास भेजा
🌟 उपरोक्त चारों दूतों के असफल होने के बाद अकबर ने युद्ध के लिए तैयारी शुरू कर दी और इधर महाराणा अपने सामंतों को समझाने लगे कि अब युद्ध होने ही वाला है इसलिए हमें पूर्ण रूप से युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए
हल्दीघाटी का युद्ध : हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 को महाराणा प्रताप और अकबर प्रतिनिधि मानसिंह के मध्य हुआ इस युद्ध में जहां महाराणा प्रताप की सेना संख्या 20000 थी तो वही मानसिंह के पास 80000 की विशाल सेना थी इस युद्ध में महाराणा प्रताप के सेनापति हकीम खां सूरी थे जोकि हरावल दस्ते का प्रतिनिधि कर रहे थे और राणा पूंजा भील जोकि चंद्रावल दस्ते का प्रतिनिधि कर रहे थे
हरावल : सेना का अग्रिम भाग जो कि सबसे पहले आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ता है
चंद्रावल : सेना का पिछला भाग जो सेना पर नजर बनाए रखता है
🌟 मेवाड़ के भामाशाह द्वारा महाराणा प्रताप को स्वर्ण मुद्राएं दी जिससे महाराणा प्रताप ने आगामी 20 वर्ष तक मेवाड़ की रक्षा के लिए सेना का गठन किया और उन सैनिकों को वेतन भी दिया
महाराणा का वार : महाराणा प्रताप ने मानसिंह को उसके मर्दा ने हाथी पर बैठा हुआ देखा और अपने घोड़े चेतक को आगे की ओर बढ़ाया घोड़े को आगे बढ़ता देख मानसिंह घबरा गए और महाराणा प्रताप ने अपना भाला मानसिंह की ओर पूरी शक्ति के साथ फेंका मानसिंह ओहदे में छुप गए और भाला गज संचालन को भेदता हुआ ओहदे से जा भिड़ा इस भीषण वार से मानसिंह हाथी से नीचे गिर पड़े और हाथी की सूंड पर लगी तलवारों से चेतक के पांव पर गहरा घाव लग गया जिससे चेतक घायल हो गया था
चेतक का पराक्रम : युद्ध में घायल चेतक को भी यह मालूम था कि अपने मालिक को किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना है इसलिए जब महाराणा को सभी सरदारों ने युद्ध से बाहर निकलने के लिए विवश किया तब घायल चेतक पवन वेग की रफ्तार से कुछ इस तरह आगे बढ़ता गया और पीछे आ रहे दुश्मनों को पीछे छोड़ दिया और महाराणा को 20 फीट के नाले को छलांग लगाकर पार करा दिया और वहीं पर घायल चेतक ने अपने प्राण त्याग दिए
भरत मिलाप जैसा दृश्य : जब महाराणा घायल चेतक के पास बैठे थे तब महाराणा प्रताप का छोटा भाई शक्ति सिंह उनसे मिलने आया और महाराणा प्रताप और शक्ति सिंह कई वर्षों बाद मिले तो एक दूसरे को गले से लगाया और दोनों के आंखों से अश्रु धारा बहने लगी यह मिलन रामायण में राम और भरत के मिलन जैसा था
हल्दीघाटी में महाराणा की विजय :हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की विजय होती है क्योंकि अकबर ने मानसिंह को यह आदेश दिया था कि वह किसी भी तरह महाराणा प्रताप को जीवित या मृत रूप से अपने पास लेकर आए इसमें मानसिंह असफल रहे और इससे नाराज होकर अकबर ने मानसिंह को अपने इबादत खाने में आने से मना कर दिया
महाराणा प्रताप का विजई अभियान : राणा प्रताप ने 1582 के दिवेर युद्ध से अपना विजई अभियान शुरू किया और इसके बाद उन्होंने मेवाड़ के कई स्थानों को मुगल चुंगल से आजाद करवाया
अघोषित संधि काल (1584-1597) : महाराणा की शक्ति और शौर्य को देखकर अकबर भयभीत हो गया था और उसे रात के सपनों में भी महाराणा प्रताप दिखाई देने लगे इसलिए अकबर ने 1584 से लेकर महाराणा के देव लोक गमन तक कोई भी आक्रमण मेवाड़ पर नहीं किया
बलशाली महाराणा : (1) महाराणा प्रताप बाहुबल अर्थात शक्ति और शौर्य के धनी थे जब वह युद्ध मैदान में जाते थे तो अपने साथ 80 किलो का भाला लेकर जाते थे
(2) महाराणा प्रताप 250 किलो के लोहे के कवच आभूषण पहनकर युद्ध मैदान में जाते थे
(3) बाल्यावस्था में महाराणा प्रताप ने एक जंगली शेर को भुजबल से मार गिराया और प्रजा को उसके आतंक से मुक्त कराया
(4) राणा प्रताप ने हल्दीघाटी के युद्ध मैदान में बहलोल खान को एक ही वार में घोड़े सहित दो हिस्सों में काट दिया था
महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के सभी क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था और चित्तौड़ को मुगलों के चंगुल से आजाद कराने के लिए अभियान पर निकले ही थे परंतु जब महाराणा प्रताप जंगल में धनुष की डोर चढ़ा रहे थे तब उनकी आंतरिक चोट और गहरी हो गई और महाराणा प्रताप 1597 को देवलोक गमन हो गए
अकबर भी रोया : महाराणा प्रताप की अंत्येष्टि के समाचार अकबर को मिले तो एक पल भर के लिए अकबर की आंखों में भी आंसू आ गए


4 comments
Click here for commentsबहुत ही सराहनीय प्रयास हुकम
Replyचेतक पर चढ़ हुंकार भरी
बांकडली मूंछां दे आंटी
कर में भलकी भाला की अणि
रणखेतां रेत मुगल चाटी
गिरिवर के उन्नत श्रंगो पर
Replyतरु के मेवे आहार बनें
इसकी रक्षा के लिए शिखर थे
राणा के दरबार बनें
Hkm bahut hi sundhar reaction apka
ReplyNice line for mewari king
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