Siwana Fort History in Hindi | सिवाना किला बाड़मेर – Rajput Valor, Saka & Heritage

Siwana Fort History in Hindi | सिवाना किला बाड़मेर – Rajput Valor, Saka & Heritage

राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित सिवाना किला, ऊँची पहाड़ी पर बना प्राचीन राजपूत दुर्ग, जिसके चारों ओर मैदानी क्षेत्र दिखाई दे रहे हैं।
सिवाना किला, बाड़मेर – छप्पन की पहाड़ियों पर स्थित राजपूत वीरता और अभेद्य स्थापत्य का अद्वितीय प्रतीक

सिवाना किला, राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित, एक प्राचीन और ऐतिहासिक दुर्ग है। इसे स्थानीय लोग ‘कुमथाना’ के नाम से भी जानते हैं, क्योंकि इस क्षेत्र में कुमठ के झाड़ों की भरमार है। यह किला सिर्फ एक किला नहीं, बल्कि राजपूतों की वीरता, बलिदान और युद्ध-कुशलता का प्रतीक है।

किला छप्पन पहाड़ियों पर स्थित है और इसकी बनावट इतनी मजबूत और ऊँची है कि इसे जीतना अत्यंत कठिन था। सिवाना की ऊँचाई और प्राकृतिक सुरक्षा इसे ऐतिहासिक समय में अजेय बनाती थी। यही कारण है कि कई राजपूत शासक और सेनापति इसे अपनी शरणस्थली और रणनीतिक आधार मानते थे।

सिवाना का इतिहास वीरता, बलिदान और साहस की कई कहानियों से भरा हुआ है। यहां के लोकगीत और गाथाएँ आज भी राजपूतों की शौर्य गाथाओं को जीवित रखती हैं। इस किले ने इतिहास में कई महत्वपूर्ण युद्ध और साकाओं का सामना किया, जिनमें अलाउद्दीन खिलजी और मुग़ल सम्राट अकबर के आक्रमण प्रमुख हैं।

सिवाना किले की गाथा सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं है। यह किला राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। मारवाड़ के राजाओं ने संकट के समय इसे अपनी शरणस्थली माना और कई ऐतिहासिक निर्णय यहीं लिए गए।

इसके अलावा, सिवाना किले के आसपास कई धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल हैं, जैसे हल्देश्वर महादेव मंदिर और भांडेला तालाब, जिनका ऐतिहासिक महत्व भी कम नहीं।

सिवाना किला इस बात का प्रमाण है कि राजस्थान के किले सिर्फ किलेबंदी और युद्धकला के केंद्र नहीं थे, बल्कि ये साहस, नीति, धर्म और संस्कृति का संगम भी थे।

किले का इतिहास

1. किले की स्थापना

सिवाना किले का निर्माण 10वीं शताब्दी (954 ई.) में पंवार वंश के महान शासक वीर नारायण पंवार ने करवाया था। यह किला छप्पन की पहाड़ियों की ऊँचाई पर स्थित है, जिससे इसके चारों ओर के मैदानी इलाके पूरी तरह से नजर में रहते थे।

सामरिक दृष्टि से इसका स्थान बेहद महत्वपूर्ण था। ऊँची पहाड़ियों और प्राकृतिक ढालों की वजह से दुश्मन के लिए किले तक पहुँचना लगभग असंभव था। यही कारण है कि सिवाना को इतिहास में अजेय दुर्गों में शामिल किया जाता है।

सिर्फ़ सुरक्षा ही नहीं, किले की स्थापत्य कला भी अत्यंत अद्वितीय थी। पत्थर और कच्ची मिट्टी का उपयोग करके बनाई गई दीवारें, मजबूत द्वार और पहाड़ियों के अनुरूप बनाए गए रास्ते इसे न केवल सैन्य दृष्टि से, बल्कि सांस्कृतिक और स्थापत्य दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाते हैं।

सिवाना की स्थापना उस समय की रणनीतिक दूरदर्शिता और राजपूत युद्धकला की कुशलता का जीवंत उदाहरण है, जो आज भी इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

2. अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण (1308 ई.)

सिवाना के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण और वीरता से भरा अध्याय है दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण। उस समय किले की रक्षा कर रहे थे राव सातलदेव (सोनगरा चौहान), जो अपने शौर्य और युद्धकुशलता के लिए प्रसिद्ध थे।

खिलजी की विशाल सेना ने किले को लंबे समय तक घेरा रखा। लेकिन सिवाना की ऊँचाई, मजबूत दीवारें और पहाड़ियों के प्राकृतिक सुरक्षा कवच के कारण सैनिकों को अंदर घुसने में बहुत कठिनाई हो रही थी। राव सातलदेव और उनके वीर योद्धाओं ने हर घातक हमले का डटकर सामना किया और दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

लेकिन इतिहास में कभी-कभी विश्वासघात भी वीरता की परीक्षा लेता है। अंत में भायला नामक व्यक्ति के विश्वासघात के कारण किले के भांडेला तालाब का पानी दूषित कर दिया गया। पानी और भोजन की कमी से किले की स्थिति गंभीर हो गई।

इसी कठिन परिस्थिति में राजपूतों ने दिखाया कि साहस और मर्यादा सबसे बड़ी शक्ति है। वीर योद्धाओं ने अपना केसरिया साका किया, जबकि वीरांगनाओं ने जौहर किया। यह घटना सिवाना किले का प्रथम साका के रूप में इतिहास में दर्ज है।

आखिरकार, किले पर कब्जा करने के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने इसका नाम बदलकर ‘खैराबाद’ रख दिया। लेकिन सिवाना की वीरता की गाथाएँ आज भी लोकगीतों और इतिहास में अमर हैं।

3. मारवाड़ के राजाओं की शरणस्थली

सिवाना किला सिर्फ युद्ध और सुल्तानी आक्रमण का मैदान ही नहीं रहा, बल्कि यह मारवाड़ के राजाओं की शरणस्थली के रूप में भी प्रसिद्ध है। संकट के समय, जब जोधपुर के शासकों का साम्राज्य खतरे में पड़ता, वे अपनी सुरक्षा और रणनीतिक योजना के लिए सिवाना किले की ऊँचाई और अजेय संरचना का सहारा लेते थे।

  • • राव मालदेव: शेरशाह सूरी के आक्रमण के समय, राव मालदेव ने अपने जीवन और राज्य की रक्षा के लिए इस किले में शरण ली। यहां उन्होंने दुर्ग की मजबूती और पहाड़ियों की प्राकृतिक सुरक्षा का पूरा लाभ उठाया।

  • • राव चंद्रसेन (मारवाड़ का प्रताप): अकबर के साम्राज्यवादी आक्रमण के दौरान, राव चंद्रसेन ने सिवाना किले को अपना मुख्य आधार बनाया। इस किले ने उन्हें मुग़ल सेनाओं के खिलाफ रणनीतिक लड़ाई लड़ने में सक्षम बनाया और उनके साहस की मिसाल बनी।

सिवाना किले की यह भूमिका यह साबित करती है कि यह केवल एक सैन्य किला नहीं था, बल्कि रणनीति, सुरक्षा और राजपूत साहस का केंद्र भी था। यहाँ शरण लेने वाले राजाओं ने न केवल अपनी जान बचाई, बल्कि कई ऐतिहासिक निर्णय और युद्ध की योजना भी यहीं बनाई।

4. दूसरा साका (अकबर के समय)

अकबर के शासनकाल में सिवाना किले ने एक बार फिर अपनी अजेयता और वीरता का प्रदर्शन किया। इस समय, मोटा राजा उदयसिंह ने मुग़ल सेना के साथ सिवाना पर 16वीं शताब्दी के अंत में (लगभग 1587 ईस्वी) पर आक्रमण किया। मुग़लों की विशाल सेना और आधुनिक हथियारों के बावजूद, किले की ऊँचाई और मजबूती ने उन्हें आसानी से प्रवेश करने से रोक दिया।

इस संघर्ष में सबसे यादगार और ऐतिहासिक भूमिका निभाई कल्ला रायमलोत ने। वह न केवल एक बहादुर योद्धा थे, बल्कि अपनी वीरता और निडरता के लिए पूरे मारवाड़ में प्रसिद्ध थे।

कल्ला रायमलोत ने अपने सैनिकों के साथ मिलकर मुग़ल सेनाओं का साहसिक मुकाबला किया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि सच्ची वीरता केवल संख्या या हथियारों से नहीं, बल्कि साहस और रणनीति से आती है।

अंततः इस युद्ध में कल्ला रायमलोत ने वीरगति प्राप्त की, लेकिन उनकी वीरता और साहस की गाथाएँ आज भी लोककथाओं और इतिहास में जीवित हैं। उनका यह साहसिक संघर्ष सिवाना किले के इतिहास का दूसरा महत्वपूर्ण साका बन गया। सिवाना किला इस समय भी यह संदेश देता है कि अभेद्य किला और निडर योद्धा मिलकर इतिहास की धारा बदल सकते हैं।

 युद्ध के मुख्य पात्र

सिवाना के शासक: वीर कल्ला रायमलोत (जो मारवाड़ के राव मालदेव के पोते थे)।

आक्रमणकारी: मुगल सेना, जिसका नेतृत्व जोधपुर के मोटा राजा उदयसिंह कर रहे थे (अकबर के आदेश पर)।

किले की विशेषताएँ

सिवाना किला न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसकी भौगोलिक स्थिति, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक महत्व इसे राजस्थान के अन्य किलों से अलग बनाते हैं।

  • • भौगोलिक स्थिति:
    किला ऊँची पहाड़ी पर बना है, जिससे चारों ओर के मैदानी इलाके एक नजर में देखे जा सकते थे। यह ऊँचाई न केवल दुश्मन की दृष्टि को रोके रखती थी, बल्कि किले के सैनिकों को रणनीतिक फायदे भी देती थी।

  • • अजेय दुर्ग:
    दुर्गम पहाड़ियों और प्राकृतिक ढालों के बीच स्थित होने के कारण इसे जीतना अत्यंत कठिन था। भारी हथियार और हाथी यहां आसानी से प्रवेश नहीं कर सकते थे। यही कारण है कि सिवाना को इतिहास में अजेय किलों में गिना जाता है।

  • • सांस्कृतिक महत्व:
    सिवाना किला सिर्फ़ एक सैन्य गढ़ नहीं था, बल्कि यह राजपूत वीरता और शौर्य का प्रतीक भी रहा। आज भी लोकगीतों और गाथाओं में कल्ला रायमलोत और राव सातलदेव की बहादुरी और बलिदान गाए जाते हैं।

  • • रोचक तथ्य:
    सिवाना किले को ‘जालौर दुर्ग की कुंजी’ भी कहा जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, जालौर पर अधिकार करने के लिए पहले सिवाना किले को जीतना अनिवार्य माना जाता था। यही इसे रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।राव चंद्रसेन, जिन्हें मारवाड़ का प्रताप कहा जाता है, ने इसे अपनी शक्ति और साहस के केंद्र के रूप में इस्तेमाल किया।

कल्ला रायमलोत और उनकी "जीवित मरसिया"

सिवाना किले के इतिहास में कल्ला रायमलोत का नाम वीरता और अदम्य साहस के लिए सदैव याद किया जाएगा। वह न केवल एक योद्धा थे, बल्कि उनके साहस और रणनीतिक बुद्धिमत्ता ने सिवाना किले को कई आक्रमणों से बचाया।

जब अकबर की विशाल मुग़ल सेना ने सिवाना को घेर लिया और यह तय हुआ कि अब अंतिम युद्ध या साका होगा, तब कल्ला रायमलोत ने अपनी अद्भुत वीरता का परिचय दिया। उन्होंने बीकानेर के प्रसिद्ध कवि पृथ्वीराज राठौड़ से अपनी वीरता के डिंगल गीत (मरसिया) लिखवाए और उन्हें खुद सुनकर अपने सैनिकों को प्रेरित किया। 

पृथ्वीराज ने शानदार डिंगल भाषा में मरसिये लिखे, जिन्हें सुनकर कल्ला ने कहा— अब मैं इन गीतों की लाज रखने के लिए युद्ध में वैसी ही वीरता दिखाऊंगाओर जब युद्ध की वेला आई तब कल्ला रायमलोत ने कवि पृथ्वीराज राठौड़ की कलम का मान रखा और इतिहास m अमर हो गए|

युद्ध के समय, कल्ला रायमलोत ने अपने परिवार को विदा किया और मुगलों के सामने अद्वितीय साहस का प्रदर्शन किया। कहा जाता है कि युद्ध में उनका सिर काटा गया, लेकिन उनका धड़ कुछ देर तक लड़ता रहा, जो उनकी अपरंपार वीरता और निडरता का प्रतीक माना जाता है।

उनकी यह कहानी न केवल सिवाना किले के साहसिक इतिहास को उजागर करती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि सच्ची वीरता केवल युद्ध में ही नहीं, बल्कि मर्यादा और सम्मान की रक्षा में भी दिखाई देती है। कल्ला रायमलोत का यह अद्भुत साहस आज भी राजस्थान के लोकगीतों और इतिहास में जीवित है, और हर आगंतुक को प्रेरित करता है।

साका और जौहर

जब मुगल सेना ने किले को चारों तरफ से घेर लिया और संसाधन खत्म होने लगे, तब राजपूतों ने अंतिम निर्णय लिया:

1.जौहर: कल्ला रायमलोत की रानी (बूंदी के राव सुरजन हाडा की पुत्री) और अन्य वीरांगनाओं ने अग्नि में कूदकर अपने सतीत्व की रक्षा की।

2.केसरिया (साका): कल्ला रायमलोत ने अपने योद्धाओं के साथ किले के द्वार खोल दिए और 'केसरिया' बाना पहनकर भूखे शेरों की तरह मुगल सेना पर टूट पड़े।

किले के प्रमुख द्वार (Pols)

सिवाना किले की सुरक्षा और अभेद्यता में इसके द्वार (Pols) का बहुत बड़ा योगदान था। प्रत्येक द्वार को रणनीतिक रूप से इस तरह बनाया गया था कि दुश्मन को प्रवेश करना मुश्किल हो और किले की रक्षा मजबूत बनी रहे।

  1. लोह पोल (Loha Pol):
    यह किले का मुख्य और सबसे मजबूत प्रवेश द्वार था। पुराने समय में इसे मोटी लोहे की चादरों और नुकीले कीलों से सुरक्षित किया जाता था। इसका उद्देश्य था कि दुश्मन के हाथी या सैनिक इसे आसानी से तोड़ न सकें।

  2. सूरज पोल (Suraj Pol):
    पूर्व दिशा की ओर स्थित यह द्वार स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका नाम सूरज इसलिए रखा गया क्योंकि यह द्वार सूर्योदय की पहली किरणों को किले में प्रवेश करने देता था। यह द्वार सामरिक दृष्टि और धार्मिक प्रतीक दोनों में महत्वपूर्ण था।

  3. हाथी पोल (Hathi Pol):
    यह द्वार आकार में विशाल था और इसका नाम इसी वजह से पड़ा कि यहां से सज-धज वाले हाथी आसानी से निकल सकते थे। युद्ध के समय, हाथी पोल की सुरक्षा सबसे कड़ी होती थी, क्योंकि यह बड़े हमले और घेराबंदी के लिए मुख्य मार्ग था।

  4. पाडल पोल (Padal Pol):
    यह द्वार किले के ऊँचे रास्तों पर स्थित था और किले के अंदरूनी हिस्सों में जाने के लिए महत्वपूर्ण था। इसके अलावा, किले के अंदर कुछ छोटे प्रवेश द्वार और चौकियाँ भी बनाई गई थीं, जो रक्षा के लिए रणनीतिक रूप से उपयोगी थीं।

इन द्वारों की मजबूती और डिज़ाइन ने सिवाना को अभेद्य दुर्ग बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई।

अन्य महत्वपूर्ण संरचनाएँ

सिवाना किला सिर्फ़ अपने ऊँचे पहाड़ी पर बने दुर्ग और मजबूत द्वारों के लिए ही नहीं, बल्कि अंदरूनी संरचनाओं और ऐतिहासिक स्थल के लिए भी प्रसिद्ध है। ये संरचनाएँ किले की सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाती हैं।

  • • भांडेला तालाब:
    भांडेला तालाब केवल पानी का स्रोत ही नहीं, बल्कि सिवाना किले के इतिहास में प्रथम साका का स्थल भी है। अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय इस तालाब का पानी दूषित कर दिया गया था, जिससे किले में खाने-पीने की कमी हुई और राजपूतों ने वीरतापूर्वक केसरिया साका और जौहर किया। यह तालाब आज भी इतिहास प्रेमियों के लिए सिवाना की वीरता की याद दिलाता है।

  • • हल्देश्वर महादेव मंदिर:
    किले के पास ही पहाड़ियों में स्थित यह मंदिर धार्मिक और प्राकृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसे ‘मारवाड़ का लघु माउंट आबू’ भी कहा जाता है। मानसून के समय यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता देखते ही बनती है – हरियाली, फव्वारे और प्राचीन स्थापत्य कला मिलकर इसे एक अद्वितीय स्थल बनाते हैं।

  • • कल्ला रायमलोत का थड़ा:
    कल्ला रायमलोत की वीरता और निडरता की स्मृति में यह स्मारक बनाया गया है। यह थड़ा उनके अद्वितीय साहस, अंतिम युद्ध और ‘जीवित मरसिया’ की याद दिलाता है। आगंतुक यहां जाकर उनके साहस की कहानियों को महसूस कर सकते हैं और इतिहास में जीवित उस वीरता को समझ सकते हैं।

इन संरचनाओं के माध्यम से सिवाना किला केवल एक युद्ध का गढ़ ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक और वीरता की गाथाओं का जीवंत स्थल भी बन जाता है।

निष्कर्ष

सिवाना किला केवल एक सैन्य दुर्ग नहीं है। यह राजपूत वीरता, अदम्य साहस, संस्कृति और स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है। इसकी ऊँचाई, अजेय बनावट और रणनीतिक महत्व इसे राजस्थान के प्रमुख ऐतिहासिक किलों में शुमार करते हैं।

किले की दीवारों में छुपी कहानियाँ वीर योद्धाओं की शौर्य गाथाओं, कल्ला रायमलोत और राव सातलदेव की निडरता, और मारवाड़ के राजाओं की रणनीति की झलक देती हैं। यही वजह है कि यह सिर्फ़ इतिहास प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और साहसिक यात्रा के शौकीनों के लिए भी एक प्रेरणास्त्रोत बन गया है।

यदि आप राजस्थान की ऐतिहासिक यात्रा पर हैं, तो सिवाना किला आपके अनुभव को अविस्मरणीय और रोमांचक बना देगा। यहां कदम रखने से पहले आप इतिहास की उन कहानियों में खो जाएंगे, जो सदियों से इस दुर्ग की दीवारों में बसती हैं।

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