कान्हड़देव चौहान (1305-1311) | वीरमदेव चौहान

  कान्हड़देव चौहान (1305-1311) | वीरमदेव चौहान


देव भूमि के नाम से प्रख्यात सिरोही के पास स्थित जालौर यानी जब्बालीपुर जिस पर 11 वीं शताब्दी में चौहान वंश के शासक कीर्ति पाल चौहान ने प्रतिहारों को युद्ध में हराकर जालौर के चौहान वंश के संस्थापक बने।


कीर्ति पाल चौहान धर्म और हिंदू संस्कृति की रक्षा में प्राण निछावर करने वाले दिल्ली अजमेर सम्राट पृथ्वीराज चौहान के ही वंशज थे उन्होंने 1181 में प्रतिहार शासक को हराकर दुर्ग पर अधिकार किया।

 सोनगढ़ की पहाड़ी पर सुवर्ण गिरी दुर्ग का निर्माण करवाया सोनगढ़ की पहाड़ी पर बने दुर्ग में यहाँ के शासक निवास करते थे इसलिए यहाँ के चौहान सोनगरा चौहान कहलाए और वर्तमान समय में भी कीर्ति पाल चौहान के वंशज सोनगरा चौहान कहलाते हैं और उनके विभिन्न ठिकाने आज भी जालौर जिले में मौजूद है

समय के कालचक्र ने सुवर्ण गिरी दुर्ग में विभिन्न चौहान शासकों को देखा और एक समय ऐसा आया जब यह दुर्ग और सोनगरा चौहनों के कुल को गौरवान्वित और यशो गाथा से भर दिया उस समय शासक  काहड़देव चौहान बने।

 कान्हड़देव चौहान  (1305-1311)

कान्हड़देव चौहान को विरासत में मिले साम्राज्य को उन्होंने भली-भांति संभाला और अपने पूर्वजों की भांति सदैव धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते थे।
 कान्हड़देव चौहान के बेटे का नाम वीरमदेव चौहान था जिन्होंने अपने कुल की रक्त शुद्धि को बनाए रखने के लिए प्राण तक न्योछावर कर दिया था।

11 वीं शताब्दी में दिल्ली पर खिलजी वंश के वंशजों का शासन था कान्हड़देव चौहान के समकालीन दिल्ली का शासक अलाउद्दीन खिलजी था जो साम्राज्य विस्तार और स्त्री मोह के लिए ललायित रहता था अलाउद्दीन खिलजी ने 1308 सिवाना के किले पर आक्रमण किया और यहां के शीतल देव चौहान ने वीरता का परिचय देते हुए केसरिया किया 
सिवाना दुर्ग पर विजय प्राप्त करने के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर की ओर आगे बढ़ना स्वीकार किया था, लेकिन कान्हड़देव चौहान के वीर पुत्र वीरम देव चौहान ने सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ अलाउद्दीन खिलजी की सेना  पर आक्रमण किया इस आक्रमण ने अलाउद्दीन खिलजी की सेना को वापिस खदेड़ दिया और अलाउद्दीन की सेना दिल्ली की ओर चली गई जब इस बात का पता अलाउद्दीन को चला गया कि सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ वीरम देव चौहान ने उसकी पूरी सेना को खदेड़ दिया तो अलाउद्दीन गुस्से से तिलमिला उठा और इधर जालौर की जनता ने अपनी पहचान  राजा की वीरता के दर्शन किए
अलाउद्दीन की सेना गुजरात विजय के उपरांत वापिस दिल्ली की ओर लौट रही थी तब इसकी सूचना जालौर के गुप्तचरों ने कान्हड़देव चौहान को दी और कहा कि अलाउद्दीन की सेना गुजरात के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण कर और विभिन्न मंदिरों के कुछ अवशेष अपने साथ दिल्ली लेकर जा रही है। यह सब सुनते ही कान्हड़देव चौहान ने अपनी एक सेना को अलाउद्दीन की लौटती सेना पर आक्रमण करने के लिए भेजा 


कान्हड़देव चौहान की सेना ने अलाउद्दीन की सेना पर आक्रमण कर मंदिरों के विखंडित अवशेषों को अपने अधिकार में ले लिया और उन्हें मंदिर में स्थापित करने के लिए आगे बढ़े। 
जब इस बात की सूचना अलाउद्दीन को लगी कि कान्हड़देव चौहान की सेना ने उसकी सेना पर आक्रमण किया है तो वह उग्र हो गया अब अलाउद्दीन ने निश्चय किया  कि वह खुद जालौर पर आक्रमण करेगा।

और इधर कान्हड़देव चौहान ने अपने विभिन्न सामंतों को एकत्र किया और उन्हें युद्ध के लिए तैयार रहने का आश्वासन दिया

खिलजी का प्रस्ताव: खिलजी ने एक प्रस्ताव भेजा और उन्होंने कहा कि कान्हड़देव चौहान आप दिल्ली पधारे और अपने साथ बेटे को भी दिल्ली लेकर आए प्रस्ताव पर कान्हड़देव चौहान अपने सामंतों के साथ विचार विमर्श करने के बाद अपने बेटे के साथ दिल्ली रवाना हो गए।  दिल्ली के दरबार में एक राजा को सम्मान मिलना चाहिए वैसा सम्मान कान्हड़देव चौहान को नहीं मिला और वह वापस जालौर लौट आए और उनके बेटे वीरमदेव कुछ महीने दिल्ली दरबार में रुके।


वीरमदेव चौहान का जवाब: दिल्ली दरबार में वीरमदेव चौहान के तेज से फिरोजा आकर्षित हो गई अलाउद्दीन खिलजी की पुत्री फिरोजा वीरमदेव चौहान को अपना दिल दे बैठी जब वीरमदेव चौहान जालौर लौट आए तब अलाउद्दीन खिलजी ने पुत्री के विवाह का प्रस्ताव जालौर भेज दिया। वीरमदेव ने प्रस्ताव को ठुकरा दिया और उनका कहना था
"मामा लागे भटिया, कुल लागे चौहान
जे मैं परनू तूरक्कड़ी, ते पश्चिम उगे भाण "
 अर्थात मै तुर्कीस राजकुमारी से विवाह करके अपने मामा के कुल भाटी और अपने कुल चौहान को कलंकित नहीं कर सकता और यह होना संभव नहीं है कि मै तुर्की राजकुमारी से विवाह करू ऐसा संभव तभी होगा जब सूर्य पश्चिम में उगेगा।

वीरमदेव चौहान और फिरोजा
 वीरमदेव चौहान और फिरोजा

यह जवाब सुनते ही अलाउद्दीन का गुस्सा अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया और वह युद्ध की तैयारी में लग गया इधर अपनी पुत्री फिरोजा को अलाउद्दीन ने कहा कि मैं वीरमदेव चौहान को अपने साथ जरूर लाऊंगा

कान्हड़देव चौहान की सिंह गर्जना:  अलाउद्दीन ने फरमान जारी किया कि कान्हड़देव चौहान किल्ले को छोड़कर भाग जाए या दिल्ली की अधीनता स्वीकार कर ले तो अलाउद्दीन उस को जीवित छोड़ देगा यह सुनकर ही कान्हड़देव चौहान ने कहा -

“आब फट्टे धर उलटे, पड़े बख्तर रा कोट
   सिर कटे धड़ लड़े, जद छूटे जालौर "

राई रा भाव राते गया: अलाउद्दीन ने 1311 में जालौर किल्ले के चारों ओर घेराबंदी कर दी इधर कान्हड़देव चौहान और उनके बेटे वीरमदेव युद्ध के लिए तैयार थे कुछ सालों की घेराबंदी ने अलाउद्दीन का विश्वास कम किया था, जालोर का दुर्ग इतना मजबूत था कि इस दौरान दौरान तोपों का कोई असर नहीं हुआ इसलिए अलाउद्दीन ने एक अन्य प्रयास किया जो एक कहावत बन गया अलाउद्दीन ने स्थानीय व्यापारियों से राई को दुगने भावों से खरीदा और राई को उस दुर्ग की दीवारों पर छिड़काया 

जालौर का किला
जालौर का किला

राई: दीवार का खोखला पन पता करना होता है तो राई का छिड़काव किया जाता है यानी राई ऐसी दीवार पर चिप जाती है जहां की दीवार कमजोर या खोखली होती है और इस प्रयास में वह सफल हुई और उसने कमजोर दीवार पर कई सारी तोपों से एक ही दीवार पर आक्रमण कर दीवार को गिरा दिया गया 

जब इसकी सूचना कान्हड़देव चौहान को लगी तो उन्होंने केसरिया धारण किया और अपने सैनिकों को आदेश दिया कि किले के फाटक खोल दिया जाए इधर वीरमदेव चौहान भी अपने पिता के आदेश का पालन करते हुए शत्रु सेना पर टूट पड़े।
इस युद्ध में अलाउद्दीन की सेना लाखों की गिनती में थी, तो कान्हड़देव चौहान की सेना कुछ हजारों की संख्या में थी।
युद्ध राजपूत सरदार बड़ी वीरता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और किले के अंदर राजपूत स्त्रियों ने महारानी के नेतृत्व में जोहर किया।

 "जब अगली सुबह कुछ व्यापारी बैल गाड़ी पर राई की बोरियां लेकर बेचने के लिए जा रहे थे तब जालौर के स्थानीय लोगों ने कहा कि राई का भाव रातें गया अब इस राई  के दुगने भाव  कोई नहीं देगा अर्थात अलाउद्दीन खिलजी ने रात के अंधेरे में जालौर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया और वीर राजपूत सरदार लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए "


अलाउद्दीन वीरमदेव चौहान को जिंदा पकड़ नहीं पाया और वह युद्ध के बाद वीरमदेव चौहान का सिर अपने साथ ले गए।
जब वीरमदेव चौहान के सिर को फिरोजा के सामने ले जाया गया जब वीरमदेव चौहान के सिर के ऊपर से कपड़े को बचाया गया तब वीर वीरमदेव का सिर भी बिना धड़ के घूम गया था और यह सब देख कर दिल्ली दरबार के सामंत और जनता हैरान रह गई
 सिर के घूम जाने से फिरोजा ने वीरमदेव चौहान के बारे में कहां -
"तज तुर्कानी चाल हिंदुआणि हुई हमें
भो भो रा भरतार शीश न धून सोनगरा"
अलाउद्दीन ने भी यह सब पहली बार देखा और वह आश्चर्यचकित रह गया और उधर फिरोजा यमुना नदी में कूद कर अपने प्राणों को त्याग दिया।

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