Hammir dev Chauhan | हम्मीर देव चौहान
तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविंद राज को अजमेर छोड़ने पर विवश कर देता है और गोविंद राज अजमेर से पीछे हटते हुए रणथंभौर पर अपना शासन कायम करते है रणथंभौर मे चौहान वंश का संस्थापक गोविंद राज चौहान को माना जाता है गोविंद राज चौहान के बाद यहां पर कई शासक शासन करते हैं गोविंद राज चौहान के उत्तराधिकारी क्रमशः वलन देव , प्रह्लादन , वीर नारायण , वाग्भट , जैत्र सिंह हुए
( हमीर देव चौहान के घोड़े का नाम बादल था)
धर्म सिंह लूटा हुआ खजाना लेकर जब रणथंबोर दुर्ग पहुंचे और राजा हमीर देव चौहान को इस बात का पता चला कि भीम सिंह वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं तब राजा हमीर देव चौहान ने धर्म सिंह को दोषी मानते हुए उन्हें अपनी सेना से हटा दिया और धर्म सिंह के छोटे भाई भोजराज को धर्म सिंह की जगह नियुक्त कर दिया और दूसरी तरफ पहले आक्रमण में हार का सामना करने के बाद तुर्की सेना वापस दिल्ली लौटे तब उसको अलाउद्दीन के समक्ष जलील होना पड़ा पहली हार के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने दूसरी बार फिर आक्रमण करने के लिए अपने सेनानायक उल्लग खां और नुसरत खा को आक्रमण करने के लिए पुनः भेजा जब इस बात की सूचना हमीर देव चौहान को लगी कि तुर्क सेना दोबारा आक्रमण करने के लिए आ रही है तो हमीर देव चौहान ने अपने भाई वीरम चौहान सेना अध्यक्ष रति पाल और मंगोल शरणार्थी मोहम्मद शाह को तुर्क सेना का दमन करने के लिए भेजा और इस आक्रमण में वीरमदेव चौहान की सेना कि पुनः विजय हुई दूसरी असफलता के बाद अलाउद्दीन खिलजी गुस्से से तिलमिला उठा
( रणथंंभोर का दुर्ग चारों तरफ पहाड़ियों से घिरा हुआ है इसलिए इस दुर्ग केेे बारे में अबुल फजल कहता है कि यह दुर्ग् बख्तरबंद है और बाकी सब दुर्ग नंगे हैं )
( झाईन के दुर्ग को रणथंबोर दुर्ग की कुंजी कहा जाता है अर्थात रणथंबोर पर अधिकार करने के लिए सबसे पहले झाईन दुर्ग पर अधिकार करना आवश्यक होता था )
झाईन के दुर्ग पर अधिकार करने के बाद उल्लग खां और नुसरत खा ने अपना एक दूत हम्मीर देव चौहान के पास रणथंभौर भेजा और कई शर्तों के साथ अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार करने की बात रखी परंतु हमीर देव चौहान ने इन सब बातों को अस्वीकार किया और युद्ध करने का आह्वान किया अब अलाउद्दीन खिलजी के सेनानायक उल्लग खां और नुसरत खा झाईन दुर्ग से अपनी सेना लेकर रणथंभौर के दुर्ग को घेर लिया दुर्ग के अंदर से हमीर देव चौहान की सेना ने आग के गोले बरसाने शुरू कर दिए और इस गोला बारूद के आक्रमण से अलाउद्दीन का सेनानायक नुसरत खा मारा गया नुसरत खा के मरते ही अलाउद्दीन की सेना में खलबली मच गई और सैनिक युद्ध मैदान से भागने लगे
( हमीर देव चौहान की रानी का नाम रंग देवी और उनकी एक पुत्री का नाम पदमला था )
खबर दिल्ली तक पहुंच चुकी ठीक की हमीर देव चौहान ने दुर्ग से गोला बारूद बरसाने शुरू किए और इस आक्रमण से सेनानायक नुसरत खा मारा गया यह खबर सुनते ही अलाउद्दीन ने एक विशाल सेना को लेकर रणथंभौर के दुर्ग को मजबूती के साथ घेर लिया 1 वर्ष की घेराबंदी के बावजूद अलाउद्दीन खिलजी असफल रहा और दूसरी तरफ हमीर देव चौहान दुर्ग के अंदर से शत्रु को जवाब दे रहे थे इधर अलाउद्दीन 1 वर्ष से भी अधिक रणथंभौर दुर्ग को घेर कर बैठा रहा जिसका फायदा अवध और अन्य रियासतों के राजा ने उठाया उन्होंने अपनी स्थिति और ज्यादा मजबूत कर ली अब अलाउद्दीन खिलजी को दिल्ली में तख्तापलट की खबर भी सुनने को मिल रहे थे ऐसी खबरों से अलाउद्दीन विचलित हो उठा और उसने निश्चय किया कि वह हमीर देव चौहान से संधि करेगा दुर्ग में यह खबर पहुंचती है कि अलाउद्दीन खिलजी संधि करना चाहता है तो हमीर देव चौहान ने अपने सेनानायक रति पाल को संधि करने के लिए अलाउद्दीन खिलजी के पास भेजा और इधर खिलजी सेनानायक को अपने साथ मिला लेता है और वचन देता है कि अगर रणथंभौर दुर्ग पर मेरा अधिकार हो जाता है तो मैं आपको अर्थात रति पाल को रणथंबोर का राजा बना दूंगा सब सुनते ही रति पाल का ईमान जवाब देना शुरू होता है और वह राज के लिए अपने राजा से गद्दारी करने का अलाउद्दीन को वचन दे देता है
( जब तुर्क सेना ने झाईन के दुर्ग पर अधिकार किया तब राजा हमीर देव चौहान कोटीज्ञा यज्ञ कर रहे थे इसलिए गुरु दास सैनी को सहायता देने वे स्वयं नहीं जा पाए )
( राजा हमीर देव चौहान ने कुल 17 युद्ध लड़े जिसमें से उनको 16 युद्धों में सफलता प्राप्त हुई थी )
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| हमीर देव चौहान |
जैत्र सिंह के 3 पुत्र थे इन तीन पुत्रों में सबसे प्रतापी वीर और शक्तिशाली पुत्र हमीर देव चौहान थे जैत्र सिंह ने अपने जीवन काल में ही हमीर देव चौहान की वीरता को देखते हुए अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया हम्मीर देव चौहान का राज्य अभिषेक 1282 में रणथंभौर के दुर्ग में हुआ राजा बनते ही हमीर देव चौहान ने रणथंभौर के छोटे से क्षेत्र में विस्तृत अपने साम्राज्य को कोटा , बूंदी , चित्तौड़ और वर्तमान जयपुर तक अपने राज्य का विस्तार कर दिया था
रणथंभौर के अब तक के चौहान शासकों में सबसे प्रतापी शासक हमीर देव चौहान ही थे उनकी शक्ति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की हमीर देव चौहान अपनी भुजबल शक्ति से एक मदमस्त हाथी का सर एक बार में ही अलग कर सकते थे
( रणथंबोर के दुर्ग का निर्माण जगत जयंत चौहान ने आठवीं शताब्दी में करवाया था )
( रणथंबोर के दुर्ग का निर्माण जगत जयंत चौहान ने आठवीं शताब्दी में करवाया था )
हमीर देव चौहान का राज्य अभिषेक
1282 में राज्य अभिषेक होते ही हमीर देव चौहान ने अपने साम्राज्य का विस्तार कर दिया था जब दिल्ली में जलालुद्दीन खिलजी का शासन था तब रणथंभौर में हम्मीर देव चौहान शासक थे दिल्ली और रणथंबोर के बीच युद्ध चौहान वंश की रणथंभौर में स्थापना से ही होने शुरू हो गए थे जब रणथंबोर में वीर नारायण का शासन था तब दिल्ली के शासक इल्तुतमिश ने रणथंबोर पर आक्रमण किया और इस आक्रमण में इल्तुतमिश को मुंह की खानी पड़ी इसके बाद भी दिल्ली और रणथंबोर के बीच मैं एक दूसरे की शक्ति और भुजबल का परीक्षण होता रहा और इन परीक्षण में रणथंबोर के शासक कहीं भारी सिद्ध हो रहे थे जब दिल्ली पर जलालुद्दीन खिलजी का शासन था तब जलालुद्दीन खिलजी ने रणथंबोर के शासक हमीर देव चौहान पर 1290 में आक्रमण किया इस आक्रमण का हमीर देव चौहान ने बड़ी सूझबूझ से जवाब दिया और जलालुद्दीन असफल रहा और उसने रणथंबोर के दुर्ग के बारे में कहा कि मैं ऐसे 10 दुर्गों को मुसलमान की दाढ़ी के एक बाल के बराबर भी नहीं समझता
ऐसा कहना जलालुद्दीन की सबसे बड़ी असफलता थी अगर वह इस दुर्ग को इतना समझता ही नहीं था तो वह इस दुर्ग पर आक्रमण करने गया ही क्यों
राजा हमीर देव चौहान द्वारा शरणार्थियों को शरण देना
जलालुद्दीन खिलजी के भतीजे और उसके दामाद अलाउद्दीन खिलजी ने जलालुद्दीन का वध करके अपने को सुल्तान घोषित कर दिया अलाउद्दीन खिलजी सुल्तान बनते ही उसने विस्तार वादी सोच और इस्लाम के प्रचार का जिम्मा उठाया अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने जब गुजरात पर आक्रमण किया और सोमनाथ मंदिर व अन्य मंदिरों के कुछ अवशेष अपने साथ दिल्ली ले जा रही थी तब अलाउद्दीन खिलजी की सेना के सेना नायक उल्लग खां और नुसरत खा के दल सैनिकों के बीच खजाने की राशि को लेकर विवाद हो गया और इस विवाद के चलते मंगोल मोहम्मद शाह और केहब्बू ने खजाने का माल लूट कर सैनिकों के दल के साथ रणथंभौर के शासक हमीर देव चौहान की शरण में आ गया
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| रणथंभोर का दुर्ग |
राजा हम्मीर देव चौहान
हम्मीर देव चौहान रणथंभौर के प्रतापी शासक थे जिन्होंने अपनी शरण में आए शरणार्थियों के लिए अपने प्राणों व साम्राज्य की आहुति दे दी हमीर देव चौहान को इतिहास में हठी शासक के रूप में जाना जाता है
हमीर देव चौहान के बारे में कहा जाता है कि -
" सिंह सवन सत्पुरुष वचन , कदली फलत एक बारतिरियो तेल हम्मीर हठ , चडे न दूजी बार "
अर्थात हमीर देव चौहान ने एक शेर की तरह राज किया जिसमें सत्य पुरुष के वचन का तप था जैसे केले के पेड़ पर एक ही बार फल उगता है उसी प्रकार हमीर देव चौहान भी अपने दिए गए वचन को पूरा करने के लिए पहला ही प्रयास सफलतापूर्वक करते थे जिस तरह शादी के बंधन में बंधने के लिए लड़की के तेल की रस्म करी जाती हैं जो जीवन में एक ही बार होती है उसी प्रकार हमीर देव चौहान भी अपने वचन और हठ से कभी समझौता नहीं करते थे
हमीर देव चौहान की सेना की लगातार अलाउद्दीन पर विजय
जब दिल्ली के शासक अलाउद्दीन खिलजी को यह सूचना मिली की मंगोल मोहम्मद शाह और केहब्बू खजाने को लूट कर रणथंभौर के शासक हमीर देव चौहान के यहां शरण ले रखी हैं तो अलाउद्दीन ने हमीर देव चौहान को अपने दुश्मनों को लौटाने को कहा परंतु हमीर देव चौहान शरणागत की रक्षा करना अपना वचन और धर्म समझते थे इसलिए उन्होंने साफ तौर पर मना कर दिया जब यह समाचार अलाउद्दीन को पता चला की हमीर देव चौहान ने मना कर दिया है दुश्मनों को लौटाने से तो अलाउद्दीन ने आक्रमण करने का निश्चय किया अलाउद्दीन खिलजी ने अपने सेनानायक उल्लग खां और नुसरत खा को आक्रमण करने के लिए भेजा अलाउद्दीन की सेना ने बनास की घाटी में अपना बसेरा डाला जब इस बात की सूचना हमीर देव चौहान को लगी तो हमीर देव चौहान ने अपने दो सेनापति भीम सिंह और धर्म सिंह को तुर्क सेना का दमन करने के लिए भेजा दोनों सेनाओं का सामना हिंदू वाट घाटी में हुआ इस आक्रमण हम्मीर देव चौहान की सेना की विजय हुई और तुर्की सेना के खजाने को लूट लिया और तुर्क सेना को भागने पर विवश कर दिया धर्म सिंह खजाने को लेकर वापिस रणथंबोर की ओर बढ़ रहे थे परंतु भीम सिंह का सामना फिर से तुर्क सेना से हुआ जिसमें भीम सिंह लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए
( हमीर देव चौहान के घोड़े का नाम बादल था)
धर्म सिंह लूटा हुआ खजाना लेकर जब रणथंबोर दुर्ग पहुंचे और राजा हमीर देव चौहान को इस बात का पता चला कि भीम सिंह वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं तब राजा हमीर देव चौहान ने धर्म सिंह को दोषी मानते हुए उन्हें अपनी सेना से हटा दिया और धर्म सिंह के छोटे भाई भोजराज को धर्म सिंह की जगह नियुक्त कर दिया और दूसरी तरफ पहले आक्रमण में हार का सामना करने के बाद तुर्की सेना वापस दिल्ली लौटे तब उसको अलाउद्दीन के समक्ष जलील होना पड़ा पहली हार के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने दूसरी बार फिर आक्रमण करने के लिए अपने सेनानायक उल्लग खां और नुसरत खा को आक्रमण करने के लिए पुनः भेजा जब इस बात की सूचना हमीर देव चौहान को लगी कि तुर्क सेना दोबारा आक्रमण करने के लिए आ रही है तो हमीर देव चौहान ने अपने भाई वीरम चौहान सेना अध्यक्ष रति पाल और मंगोल शरणार्थी मोहम्मद शाह को तुर्क सेना का दमन करने के लिए भेजा और इस आक्रमण में वीरमदेव चौहान की सेना कि पुनः विजय हुई दूसरी असफलता के बाद अलाउद्दीन खिलजी गुस्से से तिलमिला उठा
( रणथंंभोर का दुर्ग चारों तरफ पहाड़ियों से घिरा हुआ है इसलिए इस दुर्ग केेे बारे में अबुल फजल कहता है कि यह दुर्ग् बख्तरबंद है और बाकी सब दुर्ग नंगे हैं )
झाईन के दुर्ग पर तुर्को का अधिकार
अलाउद्दीन खिलजी ने लगातार हो रही और सफलता से परेशान हो गया और उसने पुनः अपने सेनानायक उल्लग खां और नुसरत खा एक विशाल सेना के साथ आक्रमण करने के लिए भेजा जब तक सेना ने दुर्ग पर आक्रमण किया तब हमीर देव चौहान ने झाईन के दुर्ग की सुरक्षा का जिम्मा गुरुदास सैनी को दे रखा था परंतु गुरु दास सैनी दुर्ग की रक्षा करनेे में सफल रहे और इस बार तुर्क सेना झाईन के दुर्ग को जीतने में सफल हुई अब अलाउद्दीन की सेना झाईन के दुर्ग को अपने अधिकार में ले चुकी थी
( झाईन के दुर्ग को रणथंबोर दुर्ग की कुंजी कहा जाता है अर्थात रणथंबोर पर अधिकार करने के लिए सबसे पहले झाईन दुर्ग पर अधिकार करना आवश्यक होता था )
झाईन के दुर्ग पर अधिकार करने के बाद उल्लग खां और नुसरत खा ने अपना एक दूत हम्मीर देव चौहान के पास रणथंभौर भेजा और कई शर्तों के साथ अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार करने की बात रखी परंतु हमीर देव चौहान ने इन सब बातों को अस्वीकार किया और युद्ध करने का आह्वान किया अब अलाउद्दीन खिलजी के सेनानायक उल्लग खां और नुसरत खा झाईन दुर्ग से अपनी सेना लेकर रणथंभौर के दुर्ग को घेर लिया दुर्ग के अंदर से हमीर देव चौहान की सेना ने आग के गोले बरसाने शुरू कर दिए और इस गोला बारूद के आक्रमण से अलाउद्दीन का सेनानायक नुसरत खा मारा गया नुसरत खा के मरते ही अलाउद्दीन की सेना में खलबली मच गई और सैनिक युद्ध मैदान से भागने लगे
( हमीर देव चौहान की रानी का नाम रंग देवी और उनकी एक पुत्री का नाम पदमला था )
खबर दिल्ली तक पहुंच चुकी ठीक की हमीर देव चौहान ने दुर्ग से गोला बारूद बरसाने शुरू किए और इस आक्रमण से सेनानायक नुसरत खा मारा गया यह खबर सुनते ही अलाउद्दीन ने एक विशाल सेना को लेकर रणथंभौर के दुर्ग को मजबूती के साथ घेर लिया 1 वर्ष की घेराबंदी के बावजूद अलाउद्दीन खिलजी असफल रहा और दूसरी तरफ हमीर देव चौहान दुर्ग के अंदर से शत्रु को जवाब दे रहे थे इधर अलाउद्दीन 1 वर्ष से भी अधिक रणथंभौर दुर्ग को घेर कर बैठा रहा जिसका फायदा अवध और अन्य रियासतों के राजा ने उठाया उन्होंने अपनी स्थिति और ज्यादा मजबूत कर ली अब अलाउद्दीन खिलजी को दिल्ली में तख्तापलट की खबर भी सुनने को मिल रहे थे ऐसी खबरों से अलाउद्दीन विचलित हो उठा और उसने निश्चय किया कि वह हमीर देव चौहान से संधि करेगा दुर्ग में यह खबर पहुंचती है कि अलाउद्दीन खिलजी संधि करना चाहता है तो हमीर देव चौहान ने अपने सेनानायक रति पाल को संधि करने के लिए अलाउद्दीन खिलजी के पास भेजा और इधर खिलजी सेनानायक को अपने साथ मिला लेता है और वचन देता है कि अगर रणथंभौर दुर्ग पर मेरा अधिकार हो जाता है तो मैं आपको अर्थात रति पाल को रणथंबोर का राजा बना दूंगा सब सुनते ही रति पाल का ईमान जवाब देना शुरू होता है और वह राज के लिए अपने राजा से गद्दारी करने का अलाउद्दीन को वचन दे देता है
( जब तुर्क सेना ने झाईन के दुर्ग पर अधिकार किया तब राजा हमीर देव चौहान कोटीज्ञा यज्ञ कर रहे थे इसलिए गुरु दास सैनी को सहायता देने वे स्वयं नहीं जा पाए )
रणमल और रति पाल का विश्वासघात और जल जोहर
रति पाल दुर्ग के अंदर मौजूद रणमल को अपनी तरफ मिला लेता है और जब अगली सुबह अलाउद्दीन की सेना दुर्ग पर आक्रमण करती है तब रणमल और रति पाल के सैनिक दल अलाउद्दीन की सेना पर आक्रमण नहीं करते हैं और उनको दूर के अंदर घुसने में मदद करते हैं जब इस बात की सूचना हमीर देव चौहान तक पहुंचती है तब तक बड़ी संख्या में तुर्क सेना दुर्ग में प्रवेश कर चुकी थी अब हमीर देव चौहान ने केसरिया करने का निर्णय लिया और अपनी सेना को आदेश दिया कि दूर के दरवाजे खोल दिए जाएं दुर्ग के दरवाजे खुलते ही चौहानों की सेना ने अलाउद्दीन की सेना पर खतरनाक तरीके से आक्रमण कर दिया इस आक्रमण में तुर्क सेना युद्ध मैदान से भाग खड़ी हुई और भागती तुर्क सेना पर चौहान राजपूतों की सेना हावी होती दिख रही थी और चौहानों की सेना ने उनके झंडों को उनसे छीन कर हवा में उड़ाने लगे उधर दूसरी तरफ दुर्ग में मौजूद महिलाएं इस युद्ध को देख रही थी उन्होंने आसमान में उड़ते तुर्क झंडों को देखकर अनुमान लगा लिया कि हमीर देव चौहान और उनकी सेना लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त और चुकी है परंतु स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत थी युद्ध के पश्चात जब हमीर देव चौहान दुर्ग में प्रवेश करते हैं तो उनको अपशकुन का अंदाजा हो जाता है हमीर देव चौहान जल जौहर को देखकर अपनी बहादुरी को दुर्ग में मौजूद शिव मंदिर में उपस्थित होकर अपनी तलवार से सिर काट कर भगवान शिव को अर्पित कर देते हैं
मंगोल शरणार्थी मोहम्मद शाह का हमीर देव चौहान के प्रति भाव
अलाउद्दीन का रणथंभौर के दुर्ग पर अधिकार हो जाता है युद्ध मैदान में मौजूद अलाउद्दीन खिलजी का कवि अमीर खुसरो कहता हैै कि आज कुफ्र का गढ़ इस्लाम का घर हो गया है और दूसरी तरफ युद्धध मैदान में घायल पड़े मंगोल शरणार्थी मोहम्मद शाह को अलाउद्दीन के लाया गया तब अलाउद्दीन खिलजी ने उससे उसके इलाज की बात कही और उसको पूरी तरीके से स्वस्थ कर ने की बात कही तो का जवाब मंगोल शरणार्थी मोहम्मद शाह ने दीया की अगर तूू मुझे ठीक कर देगा तो स्वस्थथ होते ही मैं सबसेे पहले तेरा कत्ल कर लूंगा और उसके बाद राजा हम्मीर देव चौहान के किसी भी वंशज को रणथंभौर केे दुर्ग का राजा बनाऊंगा और ताउम्र सेवा करूंगा इतना सुनते ही अलाउद्दीन ने तलवार के वार से मोहम्मद शाह का सिर अलग कर दिया युद्ध के पश्चात अगली सुबह जब रणमल और रति पाल अलाउद्दीन खिलजी के दरबार मेंं पहुंचे तब अलाउद्दीन खिलजी ने उन दोनों का सिर धड़ से अलग करते हुए यह कहा कि तुम अपने राजा के ही विश्वसनीय नहीं हो पाए तो मेरे क्या विश्वसनीय हो जाओगे कल कोई और आक्रमण करने आएगा तो तुम दोनों राज के लिए मेरे विरुद्ध भी खड़े हो जाओगे इतना कहते हुए अलाउद्दीन ने तलवार के वार से दोनों का सर अलग कर दिया अधिकार करने के पश्चात अलाउद्दीन खिलजी दुर्ग और राज्य बच्चों महिलाओं बूढ़े लोगों आदि का कत्लेआम करवाता है और दुर्ग का जिम्मा उल्लग खां को सौंप देता है हम्मीर देव चौहान के पश्चात यहां के चौहान वंश का अंंत हो जाता है
( राजा हमीर देव चौहान ने कुल 17 युद्ध लड़े जिसमें से उनको 16 युद्धों में सफलता प्राप्त हुई थी )


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