ऊँठाला का युद्ध (Battle of Untala)
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| ऊँठाला का युद्ध—मेवाड़ की आन और बलिदान की अमर कथा |
मेवाड़ की असाधारण वीरता और राजपूत गौरव की अमर गाथा
ऊँठाला का युद्ध मेवाड़ के इतिहास की एक अत्यंत साहसी, भावनात्मक और गौरवशाली घटना है। यह युद्ध केवल मुगलों के विरुद्ध संघर्ष नहीं था, बल्कि दो महान राजपूत उप-कुलों—चुण्डावत और शक्तावत—के बीच सम्मान और परंपरा की प्रतिस्पर्धा का भी प्रतीक था।
यह युद्ध महाराणा अमर सिंह प्रथम (महाराणा प्रताप के सुपुत्र) के शासनकाल में, लगभग 1599–1600 ई. के बीच लड़ा गया। हालांकि इतिहासकारों में इसकी तिथि को लेकर मतभेद हैं—कुछ इसे मुगल शासक जहाँगीर के समय 1605–1607 के मध्य मानते हैं।
कथा के अनुसार, युद्ध के समय दोनों ही कुलों के वीर महाराणा अमर सिंह के पास पहुँचे। बल्लू जी शक्तावत ने महाराणा से कहा कि उन्हें भी हरावल दस्ते में लड़ने का अवसर दिया जाए। महाराणा अमर सिंह ने साफ मना कर दियाओर कहा हरावल का अधिकार केवल चुंडावत वंशजों का है, और इसे किसी और को नहीं दिया जा सकता। इसके जवाब में बल्लू जी शक्तावत ने विनम्रता और साहस दोनों दिखाते हुए कहा महाराज, क्षमा करें, लेकिन शक्तावतों को भी एक मौका दीजिए। महाराणा अमर सिंह ने मन ही मन विचार किया और एक युक्ति निकाली। उन्होंने कहा चलो ठीक है, जो भी सरदार ऊँठाला का किला पहले जीतता है, वही हरावल दस्ते में लड़ेगा।
इस तरह शुरू हुआ वह युद्ध, जिसने मेवाड़ के वीर योद्धाओं की अमर गाथा और बलिदान की कहानी को इतिहास में अमर कर दिया।
युद्ध की पृष्ठभूमि
ऊँठाला का किला सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। उस समय यह किला मुगलों के अधीन था। इस किले की रक्षा का दायित्व मुगल बादशाह ने अपने सबसे प्रिय सिपहसार कायम खा को दे रखा था ये किला उदयपुर से 40 किलोमीटर की दूरी पर वल्लभनगर में स्थित है|महाराणा अमर सिंह इस किले को पुनः जीतकर मेवाड़ की स्वतंत्रता और स्वाभिमान को स्थापित करना चाहते थे।
हरावल को लेकर ऐतिहासिक चुनौती
राजपूत सेना में सबसे आगे रहने वाली टुकड़ी को ‘हरावल’ कहा जाता था। जो युद्ध के समय सबसे पहले शत्रु सेना पर हमला करती थी, जिसका हक चुंडावत सरदारों को था और चुंडावत सरदारों को ये हक लगभग 200 वर्ष पहले महाराणा चुंडा (चुंडा के वंशज चुंडावत कहलाए) ने अपनी भीष्म प्रतिज्ञा से दिलाया था अर्थात् परंपरा के अनुसार हरावल में रहने का अधिकार चुण्डावत वंश के पास था।
लेकिन इस युद्ध में:
- • शक्तावतों (महाराणा प्रताप के भाई शक्ति सिंह के वंशज) ने हरावल का अधिकार माँगा।
- • विवाद सुलझाने के लिए महाराणा अमर सिंह ने शर्त रखी जो दल ऊँठाला के किले में पहले प्रवेश करेगा, वही हरावल का अधिकारी होगा।
वीरता की पराकाष्ठा
1️⃣ शक्तावतों की अद्भुत बलिदान गाथा
शक्तावत सरदारों ने किले के मुख्य गेट से युद्ध करने का निर्णय किया ओर चुंडावत सरदारों ने किले की दीवार तोड़ कर तोड़ कर अंदर जाने का निर्णय किया| दोनों सरदार में युद्ध के मोर्चो को लेकर निर्णय हो चुका था बस महाराणा अमर सिंह के आदेश आने की बात थी जैसे ही महाराणा अमर सिंह युद्ध का आदेश दिया वैसे ही शक्तावतों के वीर नेता बल्लू जी शक्तावत सीधे ऊँठाला के किले के मुख्य फाटक पर पहुँचे। हाथी की टकर से दरवाजा तोड़ने का प्रयास किया, परन्तु किले के फाटक पर लोहे की नुकीली कीलें जड़ी हुई थीं, जिनसे हाथी आगे बढ़ने से घबरा रहा था।
👉 अभूतपूर्व बलिदान
बालू जी शक्तावत ने इतिहास का अहम निर्बणय लिया ओर महावत से कहा कि ऐसे तो हरावल का हक चुंडावत सरदारों के पास रह जाएगा इसलिए किले की दरवाजों पर लगी बड़ी बड़ी किलो को पकड़ कर खड़े हो गए और बोले अब हाथी को मेरे शरीर पर हमला कराओ लगातार तीन वार किये ओर दरवाजा टूट चुका था और इतिहास में बल्लू जी शक्तावत अमर हो गए।
हाथी की टक्कर से:
- • बल्लू जी का शरीर बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गया
- • लेकिन किले का विशाल फाटक टूट गया
यह बलिदान राजपूत इतिहास में अद्वितीय माना जाता है। लेकिन दूसरी तरफ भी चुंडावत सरदार इतिहास की अमर गाथा लिख रहे थे
2️⃣ चुण्डावतों का अंतिम और निर्णायक त्याग
दूसरी ओर, रावत जैत सिंह चुण्डावत सीढ़ियों की सहायता से किले की दीवार पर चढ़े। दीवार के ऊपर पहुँचते ही उन्हें गोली लगी और वे नीचे गिरने लगे।
👉 अमर निर्णय
रावत जैत सिंह को भय था कि कहीं शक्तावत पहले किले में प्रवेश न कर जाएँ।
उन्होंने अपने सैनिकों से कहा मेरा सिर काटकर किले के भीतर फेंक दो।
उनके सैनिकों ने आदेश का पालन किया। रावत जैत सिंह का कटा हुआ सिर किले के भीतर जा गिरा। जैसे ही शक्तावत अंदर घुसे दरवाजा तोड़ कर उस से पहले उनके सामने रावत जैत सिंह चुण्डावत का कटा हुवा सिर पड़ा था जैसे कह रहा हो कि आगे भी हरावल में चुंडावत ही लड़ेंगे|
युद्ध का परिणाम
जब बल्लू जी शक्तावत फाटक तोड़कर किले के भीतर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि रावत जैत सिंह का सिर पहले से ही किले के अंदर पड़ा हुआ था। इस प्रकार शर्त के अनुसार हरावल का अधिकार चुण्डावतों के पास ही रहा और ये युद्ध भी मेवाड़ के वीर योद्धा ने जीत लिया
महाराणा अमर सिंह का ऊँठाला किले पर अधिकार हो गया परन्तु इस युद्ध में महाराणा अमर सिंह ने अपने दो महत्वपूर्ण युद्ध के वीरों को खो दिया ओर ये दोनों योद्धा इतिहास में अमर हो गये थे|मुगलों को एक ओर हार देखनी पड़ी थीं|
ऐतिहासिक महत्व
ऊँठाला का युद्ध यह सिद्ध करता है कि मेवाड़ के योद्धाओं के लिए सम्मान, परंपरा और अधिकार—जीवन से भी अधिक मूल्यवान थे। यह युद्ध केवल तलवारों की टकराहट नहीं, बल्कि राजपूत आन-बान-शान और आत्मबलिदान की चरम कथा है।
निष्कर्ष
ऊँठाला का युद्ध मेवाड़ के इतिहास में केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि यह राजपूत आन-बान-शान, परंपरा और आत्मबलिदान की सर्वोच्च मिसाल था। इस युद्ध में यह स्पष्ट हो गया कि मेवाड़ के वीरों के लिए सम्मान और अधिकार जीवन से भी अधिक मूल्यवान थे।
बल्लू जी शक्तावत का अभूतपूर्व बलिदान और रावत जैत सिंह चुण्डावत का अद्वितीय त्याग यह सिद्ध करता है कि राजपूत योद्धा विजय से अधिक धर्म, मर्यादा और परंपरा को महत्व देते थे।
भले ही हरावल का अधिकार चुण्डावतों के पास रहा, लेकिन इस युद्ध ने दोनों कुलों की वीरता को अमर कर दिया।
ऊँठाला का युद्ध आज भी हमें यह स्मरण कराता है कि मेवाड़ की धरती पर रण केवल तलवारों से नहीं, बल्कि साहस, त्याग और स्वाभिमान से लड़े जाते थे।
बिलकुल! 😊
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