“राई रा भाव राते ही गया” – जालौर की वीरभूमि से जन्मी कहावत की ऐतिहासिक कथा

“राई रा भाव राते ही गया” – जालौर की वीरभूमि से जन्मी कहावत की ऐतिहासिक कथा

जालौर का सुवर्णगिरी दर्ग

जालौर दुर्ग की ऐतिहासिक गाथा – विश्वासघात, साका और “राई रा भाव” की कहानी जिसने इतिहास बदल दिया।
जालौर दुर्ग की ऐतिहासिक गाथा – विश्वासघात, साका और “राई रा भाव” की कहानी जिसने इतिहास बदल दिया

राजपुताने की धरती वीरता, त्याग और स्वाभिमान की गाथाओं से भरी पड़ी है। इन्हीं गाथाओं में से एक है प्रसिद्ध कहावत—
“राई रा भाव राते ही गया।” यह कहावत केवल बाजार के उतार-चढ़ाव की कहानी नहीं, बल्कि जालौर दुर्ग के पतन और एक विश्वासघात से जुड़ी ऐतिहासिक लोककथा है। अरावली की पहाड़ियों पर स्थित जालौर दुर्ग अपने समय में अत्यंत सुदृढ़ और लगभग अजेय माना जाता था। इसकी ऊँची प्राचीरें, संकरी चढ़ाई और मजबूत द्वार इसे प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करते थे।13वीं शताब्दी के अंत और 14वीं शताब्दी के आरंभ में यहाँ सोनगरा चौहान वंश का शासन था। उस समय के शासक थे कान्हड़देव चौहान 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • • समय: 1311–1312 ईस्वी
  • • दिल्ली के सुल्तान: अलाउद्दीन खिलजी
  • • जालौर के शासक: कान्हड़देव (सोनगरा चौहान वंश)

उस समय जालौर दुर्ग राजपुताने के सबसे सुदृढ़ किलों में गिना जाता था। इसकी ऊँची दीवारें और कठिन भौगोलिक स्थिति इसे लगभग अजेय बनाती थीं। गुजरात जाने के लिए जालोर होकर ही गुजारना पड़ता था जब एक बार अलाउद्दीन की सेना गुजरात से वापिस लौट रही थी तब कान्हड़देव को सूचना मिली कि मंदिर को तोड़ कर उसके अवशेष दिल्ली लेकर जा रहा है तब कान्हड़देव अपनी सेना को लेकर अलाउद्दीन की सेना पर आक्रमण कर दिया था|

कूटनीति और विश्वासघात

 अलाउद्दीन को जब समाचार पहुंचा की कान्हड़देव ने गुजरात से लौट रही सेना पर आक्रमण कर दिया तब अलाउद्दीन सेना लेकर जालोर के स्वर्णागिरी दुर्गा को चारों तरफ से गिरने के लिए निकल पड़ा कई महीनो तक किले के चारों तरफ घेरा डाले रखा लेकिन जब विजय नजर नहीं आ रही थी, तब छल का सहारा लिया गया।

कान्हड़दे प्रबंध जैसे काव्य ग्रंथों और लोकगाथाओं में वर्णित के अनुसार, किले के एक सरदार बीका दहिया को लालच देकर सुल्तान ने अपनी बातों में लेकर लोभ लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। बीका दहिया ने बताया कि किले की एक दीवार अंदर से कच्ची है, लेकिन उसकी पहचान करना कठिन है।

राई का प्रयोग – एक अनोखी योजना

जब युद्ध के सभी प्रयास विफल होते दिखाई दिए, तब बीका दहिया द्वारा सुझाई गई योजना को अमल में लाया गया। रात का समय चुना गया, ताकि किले के भीतर किसी को संदेह न हो। सैनिकों ने किले की दीवारों पर पानी छिड़कवाया और उसके बाद राई के बीज बिखेर दिए। विचार यह था कि जहाँ दीवार भीतर से कच्ची होगी, वहाँ मिट्टी और नमी अधिक होने के कारण राई के बीज शीघ्र अंकुरित हो जाएँगे। बाहर से देखने पर पूरी दीवार समान और मजबूत प्रतीत होती थी, इसलिए यह उपाय कमजोर स्थान को पहचानने का एक गुप्त और चतुर तरीका माना गया।

सुल्तान ने तुरंत आसपास के गाँवों से जितनी भी राई मिल सके, खरीद लेने का आदेश दिया। अचानक इतनी बड़ी मात्रा में मांग बढ़ने से बाजार में हलचल मच गई। गाँवों में खबर फैल गई कि सुल्तान को राई की सख्त आवश्यकता है। व्यापारियों और किसानों ने इसे अवसर समझा और ऊँचे दामों पर राई बेचनी शुरू कर दी। कुछ ही समय में राई का भाव कई गुना बढ़ गया। रात भर सैनिक अपना काम करते रहे, और सुबह होते-होते किले की दीवार के एक हिस्से पर हल्की-सी हरियाली उभरती दिखाई दी। यही वह स्थान था जहाँ दीवार भीतर से कमजोर थी। इसके बाद उसी भाग को तोड़कर सेना ने किले में प्रवेश का मार्ग बना लिया।

कहावत का जन्म

उधर, आसपास के दूसरे गाँवों में खबर फैल चुकी थी कि राई का भाव अचानक बहुत बढ़ गया है। कई व्यापारी अपनी-अपनी बोरियाँ भरकर यह सोचते हुए किले की ओर चले कि वे भी ऊँचे दाम पर राई बेचकर लाभ कमा लेंगे। लेकिन जब वे पहुँचे, तब तक सब कुछ बदल चुका था। राई की जरूरत केवल एक रात के लिए थी, और वह रात बीत चुकी थी।

जब उन्होंने अपनी राई बेचने की कोशिश की, तो उन्हें ठंडा-सा उत्तर मिला—

राई रा भाव तो राते ही गया!

अर्थात जिस ऊँचे भाव में राई बिकनी थी, वह अवसर रात के साथ ही समाप्त हो गया।

अंतिम संघर्ष और वीरता

जब किले की प्राचीरें टूटने लगीं और शत्रु के भीतर प्रवेश का मार्ग खुल गया, तब जालौर में अंतिम निर्णय का क्षण आ पहुँचा। अब यह केवल किले की रक्षा का प्रश्न नहीं था, बल्कि स्वाभिमान और मर्यादा की रक्षा का समय था।

राजपूत वीरों ने परंपरा के अनुसार केसरिया बाना धारण किया। यह संकेत था कि अब वे लौटने के लिए नहीं, बल्कि अंतिम शौर्य प्रदर्शन के लिए रणभूमि में उतर रहे हैं। इसे ही “साका” कहा जाता है—एक ऐसा अंतिम युद्ध जिसमें विजय की आशा नहीं, केवल सम्मान की रक्षा का संकल्प होता है।

किले के भीतर स्त्रियों ने भी अपने निर्णय ले लिए थे। परंपरा के अनुसार उन्होंने अग्नि को साक्षी मानकर जौहर किया, ताकि पराजय के बाद अपमान का सामना न करना पड़े। यह दृश्य केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि उस युग की मानसिकता, मर्यादा और स्वाभिमान की चरम अभिव्यक्ति माना जाता है।

इसी अंतिम संघर्ष में जालौर के शासक कान्हड़देव ने रणभूमि में वीरगति प्राप्त की। लोकगाथाओं में उनका वर्णन एक ऐसे शासक के रूप में किया जाता है जिसने अंत तक आत्मसमर्पण नहीं किया।

विश्वासघाती का अंत

लोकगाथाओं में वर्णित है कि जब बीका दहिया अपनी कुटिल योजना सफल होने के बाद घर पहुँचा, तो उसने गर्व से अपनी पत्नी को बताया कि उसने सुल्तान की सहायता की है और बदले में उसे बड़ा इनाम मिलने वाला है। उसे लगा कि वह कोई महान कार्य कर आया है, परंतु उसकी पत्नी के लिए यह समाचार किसी वज्रपात से कम नहीं था।

राजपूती परंपरा में स्वामीभक्ति और मातृभूमि के प्रति निष्ठा सर्वोपरि मानी जाती थी। पत्नी ने जब यह सुना कि उसके अपने पति ने लालच में आकर किले और राज्य से विश्वासघात किया है, तो उसने उसे क्षमा करने योग्य नहीं समझा। लोककथाओं के अनुसार, उसने उसी क्षण तलवार उठाई और अपने ही पति का वध कर दिया।

इसके बाद वह तत्काल किले की ओर दौड़ी, ताकि राजा को इस षड्यंत्र की सूचना दे सके। परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। दीवार टूट चुकी थी, युद्ध अपने अंतिम चरण में पहुँच चुका था, और जालौर का भाग्य लगभग तय हो चुका था।

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