मेहरानगढ़ किला जोधपुर का इतिहास: राठौड़ शौर्य, युद्ध और रहस्यों की गाथा (Mehrangarh Fort Jodhpur History in Hindi)

मेहरानगढ़ किला जोधपुर का इतिहास: राठौड़ शौर्य, युद्ध और रहस्यों की गाथा (Mehrangarh Fort Jodhpur History in Hindi)

जोधपुर का ऐतिहासिक मेहरानगढ़ किला भारत के सबसे विशाल और भव्य किलों में से एक है। मारवाड़ की वीरता और स्थापत्य कला का प्रतीक यह किला एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है, जहाँ से पूरे "नीले शहर" (Blue City) का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। जोधपुर की 'चिड़ियाटूँक' पहाड़ी पर स्थित मेहरानगढ़ किला अपनी मजबूती और खूबसूरती के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इसे "मयूरध्वज गढ़" के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसकी आकृति मोर के समान है।
Mehrangarh Fort Jodhpur
जोधपुर मेहरानगढ़ किला ब्लू सिटी दृश्य

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इस किले की नींव 12 मई 1459 को राव जोधा (जोधपुर के संस्थापक) ने रखी थी। कहा जाता है कि किले की नींव में 'राजाराम मेघवाल' नाम के व्यक्ति को स्वेच्छा से जीवित दफनाया गया था ताकि किले का भविष्य सुरक्षित रहे। किले के निर्माण में कई शताब्दियों का समय लगा, जिससे इसमें विभिन्न कालखंडों की वास्तुकला की झलक मिलती है।

2. किले की मुख्य विशेषताएं

• मेहरानगढ़ अपनी विशाल दीवारों और सात द्वारों (पोल) के लिए जाना जाता है।

 • प्रमुख द्वार: इनमें 'जय पोल' (महाराजा मान सिंह द्वारा निर्मित), 'लोहा पोल' और 'फतेह पोल' सबसे महत्वपूर्ण हैं। लोहा पोल पर आज भी रानियों के हाथों के निशान (सती के निशान) देखे जा सकते हैं।
 
• ऊंचाई: यह किला सड़क से लगभग 400 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, जिसकी दीवारें 100 फीट से भी ज्यादा ऊंची और 70 फीट तक चौड़ी हैं।
 
• वास्तुकला: किले के भीतर नक्काशीदार जालीदार खिड़कियां, ऊंचे खंभे और भव्य महल पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

3. किले के भीतर दर्शनीय स्थल

किले के अंदर कई खूबसूरत महल और संग्रहालय हैं:

 • मोती महल: यहाँ की छतों पर सोने के काम की चमक देखते ही बनती है।

 • शीश महल: शीशों की कारीगरी के लिए प्रसिद्ध।

 • फूल महल: इसे महाराजा अभय सिंह ने बनवाया था, जहाँ नाच-गाने और मनोरंजन की महफिलें सजती थीं।

 • चामुंडा माता मंदिर: यह राव जोधा की इष्टदेवी का मंदिर है और जोधपुर वासियों की गहरी आस्था का केंद्र है।

 • संग्रहालय: यहाँ पालकियों, हाथियों के हौदों, राजस्थानी पगड़ियों और प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों का अद्भुत संग्रह है। जिसको आप नीचे विस्तार से पढ़ सकते है

4. दिलचस्प तथ्य

 • तोपखाना: किले की छतों पर भारी-भरकम तोपें रखी हैं, जिनमें 'किलकिला तोप' सबसे प्रसिद्ध है।

 • हॉलीवुड और बॉलीवुड: इस किले की भव्यता के कारण यहाँ 'द डार्क नाइट राइजेज' (बैटमैन सीरीज) और 'मणिकर्णिका' जैसी फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है।

 • यूनेस्को की सूची: यह किला अपनी अद्वितीय विरासत के कारण विश्व धरोहरों की श्रेणी में गिना जाता है।

 " मेहरानगढ़ किला केवल पत्थरों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह मारवाड़ के राजाओं के शौर्य, त्याग और कलात्मक सोच की एक जीती-जागती गाथा है।"

मेहरानगढ़ किले की यात्रा की योजना बनाने के लिए यहाँ कुछ बेहद महत्वपूर्ण और व्यावहारिक जानकारियां दी गई हैं:

• घूमने का सबसे अच्छा समय (Best Time to Visit), जोधपुर एक रेगिस्तानी इलाका है, इसलिए मौसम का ध्यान रखना बहुत जरूरी है इसलिए सबसे अच्छा समय (अक्टूबर से मार्च) और सर्दियाँ यहाँ घूमने के लिए सबसे सुखद होती हैं। धूप सुनहरी और सुहावनी होती है, जिससे किले की चढ़ाई थकाती नहीं है।

• मानसून (जुलाई से सितंबर)के दौरान, बारिश के बाद यहाँ की चट्टानें और आसपास का नजारा बहुत सुंदर हो जाता है, लेकिन उमस थोड़ी बढ़ सकती है।

• गर्मी (अप्रैल से जून), यहाँ जाने से बचें क्योंकि तापमान 40-45°C तक पहुँच जाता है, जो काफी कष्टदायक हो सकता है।

कैसे पहुँचें? (How to Reach)

• मेहरानगढ़ किला जोधपुर शहर के बीचों-बीच एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है और यहाँ पहुँचना बहुत आसान है ऑटो-रिक्शा और टैक्सी के द्वारा शहर के किसी भी हिस्से से आप सीधे किले के मुख्य द्वार तक ऑटो या टैक्सी ले सकते हैं।

• पैदल रास्ता द्वारा भी पहुंच सकते हैं यदि आप पुरानी सिटी (ब्लू सिटी) के पास ठहरे हैं, तो आप टेढ़े-मेढ़े और संकरे रास्तों से होते हुए 15-20 मिनट में पैदल भी किले तक पहुँच सकते हैं। यह रास्ता थोड़ा चढ़ाई वाला है लेकिन बहुत ही सुंदर है।

• जोधपुर कैसे आएँ: जोधपुर शहर हवाई मार्ग (Jodhpur Airport), रेल (Jodhpur Junction) और सड़क मार्ग से दिल्ली, जयपुर, मुंबई जैसे बड़े शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

यहाँ मेहरानगढ़ किले पर हुए प्रमुख आक्रमणों और उनसे जुड़ी वीरता की कहानियों का विवरण है:

मेहरानगढ़ किला अपनी ऊंचाई और बेहद मजबूत दीवारों के कारण 'अजेय' माना जाता रहा है। इतिहास में इस पर कई बार आक्रमण हुए, लेकिन इसे पूरी तरह जीत पाना दुश्मनों के लिए लगभग असंभव रहा। लेकिन फिर भी मेहरानगढ़ पर प्रमुख ऐतिहासिक आक्रमण हुए|

1. जयपुर और बीकानेर की संयुक्त सेना का हमला (1807)

• यह मेहरानगढ़ के इतिहास का सबसे भीषण घेराव माना जाता है। आक्रमण का कारण कृष्णा कुमारी (मेवाड़ की राजकुमारी) से विवाह को लेकर जोधपुर के महाराजा मान सिंह और जयपुर के महाराजा जगत सिंह के बीच विवाद हो गया था।
• जयपुर की विशाल सेना ने बीकानेर और अमीर खान पिंडारी के साथ मिलकर किले को घेर लिया। महीनों तक घेराबंदी चली और किले पर तोपों से भारी गोलाबारी की गई। लेकिन किले की ऊंचाई और मजबूती के कारण दुश्मन की तोपें बेअसर साबित हुईं। अंत में, जयपुर की सेना को घेरा उठाकर वापस जाना पड़ा। आज भी किले की दीवारों पर उन तोपों के गोलों के निशान देखे जा सकते हैं।

2. शेरशाह सूरी का आक्रमण (1544)

• दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी ने राव मालदेव के शासनकाल के दौरान मारवाड़ पर आक्रमण किया। गिरि-सुमेल का युद्ध,  हालांकि यह युद्ध किले से दूर लड़ा गया था, लेकिन शेरशाह सूरी जोधपुर की सेना की वीरता देखकर इतना डर गया था कि उसने कहा था— "खैर हुई, वरना मैंने एक मुट्ठी बाजरे के लिए हिंदुस्तान की बादशाहत खो दी होती।" इसके बाद सूरी ने किले पर कब्जा तो किया, लेकिन वह इसे लंबे समय तक नहीं रख पाया।

3. मुगल बादशाह अकबर का घेराव (1564)

• अकबर के सेनापति हुसैन कुली खान ने जोधपुर पर आक्रमण किया। उस समय राव चंद्रसेन (जिन्हें 'मारवाड़ का प्रताप' कहा जाता है) शासक थे। लगातार संघर्ष और संसाधनों की कमी के कारण राव चंद्रसेन को किला छोड़ना पड़ा और वे पहाड़ों में चले गए, जहाँ से उन्होंने मुगलों के खिलाफ 'छापामार युद्ध' जारी रखा। करीब 20 साल तक यह किला मुगलों के अधीन रहा।

4. औरंगजेब का अधिकार (1678)

• महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद, मुगल बादशाह औरंगजेब ने जोधपुर को 'खालसा' (सीधे केंद्र के नियंत्रण में) घोषित कर दिया था। वीर दुर्गादास राठौड़ ने औरंगजेब के खिलाफ 30 वर्षों तक संघर्ष किया और अंततः जसवंत सिंह के पुत्र अजीत सिंह को फिर से गद्दी पर बिठाकर किले को मुगलों से मुक्त कराया।

मेहरानगढ़ को जीतना कठिन होने के तीन मुख्य कारण थे

(1) ऊंचाई और ढलान

• किला एक सीधी खड़ी पहाड़ी पर है। भारी तोपें ऊपर ले जाना नामुमकिन था, जबकि किले के ऊपर से तोपें नीचे खड़े दुश्मन को आसानी से निशाना बना सकती थीं।

(2) टेढ़े-मेढ़े रास्ते

• किले के द्वार (पोल) इस तरह बनाए गए हैं कि हाथी सीधा हमला कर दरवाजा नहीं तोड़ सकते। मोड़ों पर हाथियों की रफ्तार कम हो जाती थी।

(3) भीतरी जल स्रोत

• किले के अंदर पानी के बड़े टैंक थे, जिससे लंबी घेराबंदी के दौरान भी सैनिक भूखे-प्यासे नहीं मरते थे। 

मेहरानगढ़ किले की ऐतिहासिक तोपें

• मेहरानगढ़ किले की छतों पर आज भी वे ऐतिहासिक तोपें तैनात हैं, जिन्होंने सदियों तक दुश्मन की सेनाओं को किले के पास फटकने भी नहीं दिया। इन तोपों की गर्जना इतनी तेज होती थी कि दुश्मन के खेमे में भगदड़ मच जाती थी।
यहाँ किले की सबसे प्रसिद्ध तोपों का विवरण है

1. किलकिला तोप (Kilkila Cannon)

• यह मेहरानगढ़ की सबसे प्रसिद्ध और विशाल तोप है। इसे महाराजा अजीत सिंह ने अहमदाबाद से जीत कर लाया था। इस पर बहुत ही सुंदर नक्काशी की गई है। यह इतनी भारी है कि इसे चलाने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में बारूद की आवश्यकता होती थी।

2. शंभू बाण (Shambhu Baan)

• यह तोप अपनी मारक क्षमता के लिए जानी जाती थी। इसे महाराजा अभय सिंह ने सरबुलंद खान के खिलाफ युद्ध में जीत के प्रतीक के रूप में प्राप्त किया था। इसे किले की अग्रिम पंक्ति में रखा जाता था क्योंकि इसकी दूरी (Range) बहुत अधिक थी।

3. गजनी खान (Gajni Khan)

• यह तोप जालौर विजय के दौरान जोधपुर के बेड़े में शामिल हुई थी। यह आकार में थोड़ी छोटी है लेकिन इसका वार बहुत घातक होता था। इसका नाम दुश्मन के मन में खौफ पैदा करने के लिए काफी था।

4. जमजमा और कड़क बिजली

• जैसा कि नाम से पता चलता है, इसकी आवाज बिजली कड़कने जैसी भीषण होती थी। इसका उपयोग रात के समय दुश्मन को डराने और संकेत देने के लिए किया जाता था। यह भी एक भारी तोप है जिसका उपयोग किले की दीवारों को सुरक्षा देने के लिए किया जाता था।

इन तोपों की रक्षात्मक रणनीति

• ये तोपें किले की सबसे ऊपरी दीवार (बुर्ज) पर स्थित हैं। ऊँचाई पर होने के कारण इनकी मारक क्षमता मैदानी इलाकों की तुलना में दोगुनी हो जाती थी।

• लोहा पोल और जय पोल की सुरक्षा, इन तोपों का मुँह उन रास्तों की तरफ रखा गया था जहाँ से दुश्मन की सेना के आने का एकमात्र रास्ता था।

क्या आप जानते हैं?
मेहरानगढ़ किले में आज भी इन तोपों को उसी स्थिति में रखा गया है जैसे वे युद्ध काल में हुआ करती थीं। पर्यटक आज भी इन तोपों के पास जाकर उस समय के युद्ध कौशल को महसूस कर सकते हैं।

मेहरानगढ़ किला, श्राप और उससे जुड़ी रहस्यमयी कहानी

1. चिड़ियानाथ बाबा का श्राप

• जब 1459 में राव जोधा ने इस किले की नींव रखने के लिए 'चिड़ियाटूँक' पहाड़ी को चुना, तो वहाँ 'चिड़ियानाथ जी' नाम के एक तपस्वी बाबा रहते थे। वे पंक्षियों के बहुत प्रेमी थे।

• विवाद: राजा के आदेश पर सैनिकों ने बाबा को वह जगह खाली करने को कहा, लेकिन वे नहीं माने। अंत में उन्हें जबरदस्ती वहाँ से हटाया गया।

• श्राप: क्रोधित होकर चिड़ियानाथ बाबा ने राव जोधा को श्राप दिया— "जोधा! तेरे इस किले में हमेशा पानी की कमी रहेगी।"

• असर: कहा जाता है कि आज भी जोधपुर शहर और किले में पानी की किल्लत रहती है, और हर कुछ वर्षों में यहाँ गंभीर सूखे की स्थिति पैदा हो जाती है।

2. किले की नींव में नर-बली (राजाराम मेघवाल)

• श्राप के प्रभाव को कम करने के लिए ज्योतिषियों ने सलाह दी कि किले की नींव में किसी इंसान की स्वेच्छा से जीवित बलि देनी होगी।

• बलिदान: इस कठिन समय में राजाराम मेघवाल नाम के व्यक्ति ने राज्य की भलाई के लिए खुद को कुर्बान करने का फैसला किया।

• सम्मान: उन्हें सम्मान के साथ किले की नींव के एक खास हिस्से में जीवित दफनाया गया। राजाराम के इस बलिदान के बदले, उनके परिवार को आज भी 'राजबाग' जैसी जागीर और विशेष सम्मान दिया जाता है। किले के गेट पर उनके नाम की एक पट्टिका आज भी लगी है।

3. चामुंडा माता (2008 की घटना)

• 2008 में नवरात्रि के दौरान यहाँ एक भयानक भगदड़ मची थी जिसमें सैकड़ों लोगों की जान चली गई थी। स्थानीय लोग इसे आज भी उस पुराने श्राप या देवी की नाराजगी से जोड़कर देखते हैं।

4. सती के हाथ (लोहा पोल)

• किले के 'लोहा पोल' पर आज भी महाराजा मान सिंह की रानियों के हथेलियों के निशान बने हुए हैं। 1843 में जब महाराजा की मृत्यु हुई, तो उनकी रानियाँ सती होने के लिए इसी द्वार से बाहर निकली थीं। वे निशान आज भी वहाँ आने वाले लोगों को उस समय की रस्मों और दर्द की याद दिलाते हैं।

एक दिलचस्प तथ्य : मेहरानगढ़ की बनावट इतनी रहस्यमयी है कि रुद्रयार्ड किपलिंग (Jungle Book के लेखक) ने इसे देखकर कहा था कि "यह किला मानव ने नहीं, बल्कि परियों और फरिश्तों ने बनाया है।"

मेहरानगढ़ किले का म्यूजियम (संग्रहालय)

Mehrangarh Fort Museum Jodhpur Rajasthan
मेहरानगढ़ किले का संग्रहालय जोधपुर – राजसी पालकियाँ, अस्त्र-शस्त्र और राठौड़ इतिहास

• मेहरानगढ़ किले का म्यूजियम (संग्रहालय) भारत के बेहतरीन और सबसे सुव्यवस्थित संग्रहालयों में से एक माना जाता है। यहाँ मारवाड़ के राजाओं की आलीशान जीवनशैली और उनके युद्ध कौशल को बहुत करीब से देखा जा सकता है। मेहरानगढ़ संग्रहालय (The Museum) यह म्यूजियम किले के महलों के भीतर ही बना है। यहाँ की गैलरी में रखी वस्तुएं आपको 500 साल पीछे ले जाएंगी|

• हाथी हौदा गैलरी: यहाँ 18वीं और 19वीं शताब्दी के चांदी के 'हौदे' रखे हैं, जिनका उपयोग राजा हाथी की सवारी के लिए करते थे। इसमें शाहजहाँ द्वारा महाराजा जसवंत सिंह को भेंट किया गया बेशकीमती हौदा भी शामिल है।

•पालकी गैलरी: पुराने समय में रानियों और राजाओं द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भव्य पालकियाँ यहाँ प्रदर्शित हैं। इनमें 'महाडोल' पालकी मुख्य है जिसे 1730 में युद्ध में जीता गया था।

• दौलत खाना: इसमें मुगल काल और राजपूत काल के सोने, चांदी और कीमती रत्नों से जड़े बर्तन, गहने और सजावटी सामान रखे हैं।

• शस्त्रागार (Armoury): यहाँ राव जोधा की तलवार से लेकर अकबर की तलवार तक मौजूद है। इसके अलावा ढाल, म्यान और भारी जिरहबख्तर (Lohe का कवच) भी देखे जा सकते हैं।

• पगड़ी गैलरी: यहाँ राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों की सैकड़ों प्रकार की रंग-बिरंगी पगड़ियाँ प्रदर्शित हैं।

इसके अलावा, किले के पास एक अनोखा रेगिस्तानी पार्क भी है। आइये इनके बारे में विस्तार से जानते हैं:

1. राव जोधा डेजर्ट रॉक पार्क (Rao Jodha Desert Rock Park)

• किले के बिल्कुल बगल में स्थित यह पार्क प्राकृतिक प्रेमियों के लिए स्वर्ग है।

• स्थापना: इसे 2006 में किले के पास की चट्टानी जमीन को सुधारने के लिए बनाया गया था।

•विशेषता: यह 72 हेक्टेयर में फैला है। यहाँ की जमीन ज्वालामुखी के लावा से बनी 'रयोलाइट' (Rhyolite) चट्टानों से बनी है।

• क्या देखें: यहाँ थार रेगिस्तान की लुप्तप्राय वनस्पतियां और जीव देखे जा सकते हैं। किले की दीवारों के समानांतर चलने वाले रास्ते (Walking Trails) से किले का एक अलग ही रूप दिखाई देता है।

2. चोखेलाव बाग

• किले की तलहटी में स्थित यह एक सुंदर राजपूत गार्डन है।

• इसे 18वीं शताब्दी की शैली में पुनर्जीवित किया गया है।

• यहाँ रात के समय चमेली के फूलों की खुशबू और किले पर पड़ती रोशनी एक जादुई अहसास कराती है।

पर्यटकों के लिए कुछ जरूरी बातें

• समय: म्यूजियम सुबह 9:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक खुला रहता है।

• लिफ्ट: बुजुर्गों के लिए किले के ऊपर तक जाने के लिए लिफ्ट की सुविधा भी उपलब्ध है।

• साउंड एंड लाइट शो: शाम को यहाँ एक भव्य शो होता है जो किले के इतिहास को जीवंत कर देता है।

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