शेर की खाल: महाराणा सांगा और मेवाड़ का सिंहासन

शेर की खाल: महाराणा सांगा और मेवाड़ का सिंहासन 

महाराणा सांगा का ऐतिहासिक चित्रण, शेर की खाल पर बैठे, एक आँख में पट्टी और राजपूत भाईयों के सामने चारण देवी की भविष्यवाणी सुनते हुए
हिंदूपत महाराणा सांगा: शेर की खाल पर बैठे, भाग्य और वीरता का प्रतीक

मेवाड़ के इतिहास में वह समय ऐसा था जब चित्तौड़ के महलों में गूँजती तलवारों की आवाज़ केवल युद्ध का संकेत नहीं थी, बल्कि आने वाले भाग्य की पदचाप थी, क्योंकि महाराणा रायमल के तीनों पुत्र—पृथ्वीराज, जयमल और सांगा—वीरता, महत्वाकांक्षा और राजसिंहासन की आकांक्षा से भरे हुए थे, और गद्दी की यह होड़ धीरे-धीरे भाईचारे को वैर में बदल रही थी।

जब भविष्य को जानने की उत्कंठा असहनीय हो उठी, तब तीनों राजकुमार अपनी-अपनी कुंडलियाँ लेकर एक प्रसिद्ध चारण ज्योतिषी के पास पहुँचे, जहाँ मौन इतना गहरा था कि जैसे समय स्वयं रुक गया हो, और जैसे ही ज्योतिषी ने कुंडलियाँ देखकर सांगा की ओर संकेत करते हुए यह कहा कि मेवाड़ का राजयोग उसी के भाग्य में लिखा है, उसी क्षण बड़े भाई पृथ्वीराज के भीतर वर्षों से दबा हुआ क्रोध विस्फोट बनकर बाहर आ गया।

क्रोध में अंधे पृथ्वीराज ने बिना एक पल सोचे अपनी तलवार निकाल ली और सांगा पर प्रहार कर दिया, जिससे सांगा की एक आँख सदा के लिए जाती रही, और उस रक्त की प्रत्येक बूँद के साथ यह स्पष्ट हो गया कि यह संघर्ष अब केवल भाइयों के बीच नहीं, बल्कि नियति के साथ भी होने वाला है।

भाइयों के बीच बढ़ते इस रक्तपात को देखकर उनके काका सूरजमल ने हस्तक्षेप किया और यह सुझाव दिया कि जब मानवीय निर्णय विफल हो जाएँ, तब देवी-देवताओं के संकेतों की शरण लेनी चाहिए, और इसी सोच के साथ तीनों भाई नाहर मगरा के समीप स्थित भीमल गाँव की उस प्रसिद्ध चारण देवी के पास पहुँचे, जिनकी वाणी को स्वयं भाग्य का स्वर माना जाता था।

जब वे देवी की झोपड़ी में पहुँचे तो वह वहाँ उपस्थित नहीं थीं, और प्रतीक्षा के उन क्षणों में यह परीक्षा आरंभ हो गई, क्योंकि बैठने के लिए कुछ ही आसन थे, जहाँ पृथ्वीराज और जयमल ने अपने अहंकार और राजसी अभिमान के कारण ऊँचे और सजे हुए आसनों को चुना, जबकि सांगा ने बिना किसी दिखावे के कोने में पड़ी हुई शेर की खाल को देखा और उसी पर शांत भाव से बैठ गए।

कुछ ही समय बाद जब चारण देवी झोपड़ी में लौटीं और उन्होंने तीनों भाइयों को उनके आसनों सहित देखा, तो उनके चेहरे पर एक अर्थपूर्ण मुस्कान उभरी और उन्होंने यह वचन कहा कि मेवाड़ का स्वामी वही बनेगा जो शेर की खाल पर बैठा है, और उस एक वाक्य में वर्षों का भविष्य सिमट आया।

देवी की वाणी सुनते ही पृथ्वीराज और जयमल का क्रोध फिर भड़क उठा और उन्होंने सांगा पर पुनः आक्रमण कर दिया, जिसके कारण सांगा को अपनी जान बचाने के लिए सब कुछ छोड़कर वहाँ से निकलना पड़ा, और इस प्रकार एक राजकुमार वर्षों के अज्ञातवास में चला गया।

अज्ञातवास के उन वर्षों में सांगा ने अजमेर में कर्मचंद पंवार के यहाँ शरण ली, जहाँ समय ने चुपचाप अपना खेल खेला और उसी समय में पृथ्वीराज और जयमल दोनों ही असमय मृत्यु को प्राप्त हुए, मानो नियति स्वयं अपना निर्णय सुना चुकी हो।

अंततः सन 1509 ईस्वी में वही घायल, एक आँख से वंचित, लेकिन अदम्य साहस से भरा सांगा मेवाड़ लौटा और महाराणा सांगा के रूप में सिंहासन पर बैठा, जिसके शरीर पर आगे चलकर अस्सी से अधिक युद्ध घाव पड़े, फिर भी जो प्रत्येक युद्ध में अडिग खड़ा रहा, क्योंकि जिसने एक बार शेर की खाल को अपना आसन बना लिया हो, उसके भीतर स्वयं शेर की आत्मा बस जाती है।

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